वंदे मातरम् विवाद पर संजय सिंह का BJP पर हमला, PM मोदी को दी टेलीप्रॉम्प्टर चुनौती

वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच जारी राजनीतिक बहस अब आम आदमी पार्टी तक पहुंच गई है। AAP के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को चुनौती दी कि वह बिना टेलीप्रॉम्प्टर के पूरा ‘वंदे मातरम्’ गाकर दिखाएं। संजय सिंह ने कहा कि अगर प्रधानमंत्री ऐसा करते हैं तो वह माला पहनाकर उनका अभिनंदन करेंगे।
संजय सिंह ने इसके साथ ही बीजेपी और RSS के इतिहास को लेकर कई सवाल उठाए। हालांकि, उनके बयान में किए गए ऐतिहासिक दावे संजय सिंह के आरोप हैं और उन्हें उनके राजनीतिक बयान के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
कांग्रेस के फैसले के बाद बढ़ा विवाद
दरअसल, कांग्रेस कार्य समिति (CWC) ने अपने 1937 के प्रस्ताव के आधार पर पार्टी के कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के केवल शुरुआती दो अंतरे गाने का फैसला किया है। इसके बाद बीजेपी ने कांग्रेस पर राष्ट्रगीत के अपमान का आरोप लगाया। इसी राजनीतिक विवाद के बीच संजय सिंह ने बीजेपी पर पलटवार किया।
AAP सांसद ने कहा कि उनकी पार्टी ने वंदे मातरम् से जुड़े विधेयक का समर्थन किया था, लेकिन उन्होंने बीजेपी पर देशभक्ति के मुद्दे को राजनीतिक बहस में इस्तेमाल करने का आरोप लगाया।
‘PM मोदी बिना टेलीप्रॉम्प्टर पूरा वंदे मातरम् गाएं’
संजय सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीधे चुनौती देते हुए कहा कि अगर पीएम मोदी बिना टेलीप्रॉम्प्टर के पूरा वंदे मातरम् गा देते हैं, तो वह उनका अभिनंदन करेंगे। उन्होंने बीजेपी से यह भी सवाल किया कि उसके ऐसे चार पूर्वजों के नाम बताए जाएं, जिन्होंने वंदे मातरम् का नारा लगाते हुए जेल की सजा काटी हो।
संजय सिंह का कहना है कि बीजेपी इस सवाल का जवाब नहीं दे पाएगी। उन्होंने इस मुद्दे को बीजेपी की राष्ट्रवाद और देशभक्ति की राजनीति से जोड़ते हुए निशाना साधा।
RSS और तिरंगे को लेकर भी सवाल
संजय सिंह ने RSS और तिरंगे को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि RSS के मुख्यालय पर 52 वर्षों तक तिरंगा नहीं फहराया गया। उन्होंने RSS की शाखाओं में तिरंगा फहराने को लेकर भी सवाल किया।
उन्होंने RSS की पत्रिका ‘ऑर्गनाइजर’ के 28 दिसंबर 1949 के अंक का हवाला देते हुए राष्ट्रगान को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। संजय सिंह के मुताबिक, उस अंक में राष्ट्रगान को अधिकारियों की पार्टियों में मनोरंजन से जुड़ी चीज बताया गया था।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी और जिन्ना का मुद्दा उठाया
AAP नेता ने अपने बयान में श्यामा प्रसाद मुखर्जी का भी जिक्र किया। उन्होंने सवाल किया कि मुखर्जी ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन को लेकर ब्रिटिश गवर्नर को पत्र क्यों लिखा था।
संजय सिंह ने यह भी सवाल उठाया कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग के साथ सरकार क्यों बनाई थी। इसके अलावा उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी और जसवंत सिंह द्वारा जिन्ना की प्रशंसा किए जाने का भी मुद्दा उठाया।
इन सभी बयानों के जरिए संजय सिंह ने बीजेपी की मौजूदा राष्ट्रवादी राजनीति पर सवाल खड़े करने की कोशिश की है।
वंदे मातरम् को लेकर संजय सिंह की स्थिति
संजय सिंह ने कहा कि वंदे मातरम् का सम्मान होना चाहिए। इससे पहले भी AAP ने संसद में वंदे मातरम् को लेकर अपना समर्थन व्यक्त किया है। हालांकि, पार्टी ने बीजेपी पर इस मुद्दे का राजनीतिक इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है।
संजय सिंह ने कहा कि देशभक्ति केवल नारे लगाने या राष्ट्रगीत के मुद्दे पर राजनीति करने से साबित नहीं होती, बल्कि देश और उसके नागरिकों के प्रति जिम्मेदारी निभाने से साबित होती है।
बीजेपी और AAP के बीच बढ़ सकता है राजनीतिक टकराव
वंदे मातरम् को लेकर शुरू हुई यह बहस अब सिर्फ कांग्रेस और बीजेपी तक सीमित नहीं रह गई है। AAP के संजय सिंह के बयान के बाद बीजेपी और विपक्ष के बीच राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने के संकेत हैं।
एक तरफ बीजेपी कांग्रेस के फैसले को राष्ट्रगीत के सम्मान से जोड़ रही है, वहीं विपक्षी दल बीजेपी पर देशभक्ति के मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाने का आरोप लगा रहे हैं।
क्या है पूरा मामला?
कांग्रेस के 1937 के प्रस्ताव को आधार बनाकर पार्टी ने अपने कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के शुरुआती दो अंतरे गाने का फैसला किया है। बीजेपी ने इस पर सवाल उठाया। इसके जवाब में संजय सिंह ने बीजेपी के इतिहास, RSS, तिरंगे और राष्ट्रगान से जुड़े कई मुद्दे उठाए।
अब इस विवाद में एक तरफ वंदे मातरम् के सम्मान और उसके गायन का मुद्दा है, तो दूसरी तरफ स्वतंत्रता आंदोलन और संगठनों के ऐतिहासिक रुख को लेकर राजनीतिक बहस शुरू हो गई है।
वंदे मातरम् को लेकर शुरू हुआ विवाद आने वाले दिनों में राजनीतिक तौर पर और गर्म हो सकता है। संजय सिंह ने प्रधानमंत्री मोदी को बिना टेलीप्रॉम्प्टर पूरा वंदे मातरम् गाने की चुनौती देकर बहस को नया राजनीतिक मोड़ दिया है। साथ ही उन्होंने बीजेपी और RSS के इतिहास को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए हैं।
हालांकि, उनके द्वारा किए गए ऐतिहासिक दावों की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि अलग-अलग स्रोतों के आधार पर की जानी जरूरी है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि वंदे मातरम् अब एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है।
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