
देश में चीनी की कीमतों में अचानक आई तेजी ने एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल उठ रहा है कि क्या पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की नीति के कारण गन्ने का एक हिस्सा चीनी के बजाय इथेनॉल बनाने में चला गया और इससे बाजार में चीनी की उपलब्धता घट गई? सरकार ने इस दावे को खारिज किया है। केंद्र के मुताबिक मौजूदा तेजी के पीछे सिर्फ इथेनॉल नहीं, बल्कि कम चीनी उत्पादन, मौसम का असर, त्योहारी मांग, सीमित वैश्विक आपूर्ति और जमाखोरी जैसे कई कारण हैं।
चीनी के दाम अचानक क्यों बढ़े?
पिछले कुछ दिनों में चीनी के दाम तेजी से ऊपर गए हैं। देश के कई बाजारों में खुदरा कीमत करीब 52 रुपये से बढ़कर 62 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। यानी लगभग 20 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई है।
कोलकाता में तो खुदरा कीमत करीब 70 रुपये किलो तक पहुंचने की खबर है। कारोबारियों के मुताबिक पिछले एक महीने में यहां करीब 20 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी हुई है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर बाजार में चीनी की कमी क्यों महसूस हो रही है?
इथेनॉल का कनेक्शन क्या है?
भारत ने पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाने की नीति अपनाई है। इसके लिए चीनी उद्योग से भी इथेनॉल तैयार किया जाता है।
मौजूदा चीनी सीजन में करीब 28 लाख टन चीनी के बराबर उत्पादन इथेनॉल की ओर डायवर्ट किया गया। यही आंकड़ा इस बहस का बड़ा आधार बन गया है कि अगर यह मात्रा चीनी के रूप में बाजार में आती तो घरेलू उपलब्धता ज्यादा होती।
हालांकि, सरकार का कहना है कि मौजूदा कीमतों में उछाल को सीधे इथेनॉल नीति से जोड़ना सही नहीं है।
सरकार ने इथेनॉल को जिम्मेदार मानने से क्यों किया इनकार?
केंद्र के मुताबिक इस साल चीनी का वास्तविक उत्पादन शुरुआती अनुमान से काफी कम रहा। उद्योग का अनुमान करीब 342 लाख टन उत्पादन का था, लेकिन वास्तविक उत्पादन करीब 308 लाख टन रहा।
यानी उत्पादन में लगभग 34 लाख टन की कमी आई।
इसके अलावा खराब मौसम और कम बारिश ने कुछ प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में फसल को प्रभावित किया। दूसरी तरफ अगस्त से शुरू होने वाले त्योहारों के मौसम में चीनी की मांग बढ़ने लगी है।
सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि बाजार में जमाखोरी और सट्टेबाजी ने कीमतों को और ऊपर धकेला हो सकता है।
लेकिन इथेनॉल की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं होती
यहां मामला थोड़ा पेचीदा है।
सरकार का कहना है कि चीनी की मौजूदा महंगाई का मुख्य कारण इथेनॉल नहीं है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि गन्ने से चीनी उत्पादन का एक हिस्सा इथेनॉल की तरफ जरूर गया है।
Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा सीजन में करीब 30 लाख टन चीनी के बराबर गन्ना इथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट किया गया। ऐसे में कम उत्पादन और कम स्टॉक की स्थिति में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इथेनॉल के लिए डायवर्जन ने बाजार की उपलब्धता पर अतिरिक्त दबाव डाला।
इसलिए इसे सिर्फ “इथेनॉल की वजह से चीनी महंगी हुई” या “इथेनॉल का कोई असर नहीं है”—इन दो चरम निष्कर्षों में बांटना पूरी तस्वीर नहीं बताता।
इस बार स्टॉक भी बड़ी चिंता है
इस चीनी सीजन के अंत यानी 30 सितंबर तक देश का क्लोजिंग स्टॉक करीब 32 लाख टन रहने का अनुमान है। सामान्य जरूरत के मुकाबले यह काफी कम है। पिछले सीजन के अंत में स्टॉक करीब 47 लाख टन था, जबकि सामान्य तौर पर करीब 60 लाख टन का स्टॉक सुरक्षित माना जाता है।
यही कम उपलब्धता बाजार में कीमत बढ़ने का बड़ा कारण बन रही है।
सरकार ने उठाए कई कदम
चीनी की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र ने कई कदम उठाए हैं।
सरकार ने थोक उपभोक्ताओं के लिए स्टॉक रखने की सीमा घटाकर 15 दिन कर दी है। पहले यह सीमा 30 दिन थी। साथ ही चीनी मिलों से बिक्री और खरीदारों से जुड़ी जानकारी रिपोर्ट करने को कहा गया है।
इसके अलावा सरकार ने करीब 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। यह आयात 31 अक्टूबर 2026 तक किया जा सकेगा। करीब एक दशक बाद भारत ने घरेलू बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने के लिए इस तरह का कदम उठाया है।
क्या आयात से सस्ती होगी चीनी?
सरकार की कोशिश है कि विदेशी चीनी आने से घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़े और कीमतों पर दबाव कम हो।
लेकिन इसका असर तुरंत दिखाई देना जरूरी नहीं है। आयातित चीनी को भारत पहुंचने में समय लगेगा। इसलिए आने वाले हफ्तों में घरेलू स्टॉक, त्योहारी मांग और आयात की गति कीमतों के लिए महत्वपूर्ण होगी।
किसानों और चीनी मिलों पर भी असर
चीनी की कीमत बढ़ने से सिर्फ उपभोक्ता ही प्रभावित नहीं होते। गन्ना किसानों और चीनी मिलों के लिए भी इसका असर महत्वपूर्ण है।
इथेनॉल कार्यक्रम ने चीनी मिलों को गन्ने से आय का एक अतिरिक्त रास्ता दिया है। लेकिन अगर चीनी की कीमत बहुत ऊपर चली जाती है तो मिलों के लिए चीनी बेचना इथेनॉल उत्पादन की तुलना में ज्यादा आकर्षक हो सकता है। उद्योग से जुड़े विश्लेषण में भी इस संभावना की ओर इशारा किया गया है।
तो आखिर चीनी महंगी होने की असली वजह क्या है?
मौजूदा जानकारी को जोड़कर देखें तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है:
- चीनी उत्पादन अनुमान से कम रहा।
- गन्ने की फसल पर मौसम का असर पड़ा।
- इथेनॉल के लिए गन्ने/चीनी का एक हिस्सा डायवर्ट हुआ।
- त्योहारी सीजन में मांग बढ़ रही है।
- घरेलू स्टॉक सामान्य स्तर से नीचे जाने की आशंका है।
- कुछ बाजारों में जमाखोरी और सट्टेबाजी की शिकायतें हैं।
- सरकार ने पहले निर्यात पर रोक और अब आयात जैसे कदम उठाए हैं।
चीनी की मौजूदा महंगाई को सिर्फ इथेनॉल नीति का नतीजा बताना पूरी तरह सही नहीं होगा। सरकार ने साफ कहा है कि कीमत बढ़ने के पीछे उत्पादन में कमी, मौसम, त्योहारी मांग, कम स्टॉक और जमाखोरी जैसे कई कारण हैं।
लेकिन दूसरी तरफ यह भी तथ्य है कि इस सीजन में गन्ने/चीनी का एक हिस्सा इथेनॉल उत्पादन में गया है। इसलिए इथेनॉल और चीनी की उपलब्धता के बीच संतुलन आने वाले सीजन में सरकार के लिए अहम चुनौती रहने वाला है।
फिलहाल सरकार का फोकस बाजार में पर्याप्त चीनी पहुंचाने पर है। 10 लाख टन शुल्क-मुक्त आयात और स्टॉक सीमा में कटौती के बाद अब देखना होगा कि इन कदमों से त्योहारी सीजन से पहले चीनी के दाम कितने नीचे आते हैं।
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