अमित शाह से मुलाकात के बाद क्या बदला विजय का रुख? परिसीमन पर तमिलनाडु में सियासी घमासान

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद राज्य में परिसीमन को लेकर नई राजनीतिक बहस शुरू हो गई है। विपक्ष का आरोप है कि विजय ने कुछ ही दिनों में अपना रुख बदल दिया, जबकि उनकी पार्टी TVK का कहना है कि सरकार की मूल मांग में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
पहले क्या थी विजय सरकार की मांग?
12 अगस्त को तमिलनाडु विधानसभा ने परिसीमन के मुद्दे पर एक प्रस्ताव पारित किया था। इसमें लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या को बनाए रखने और राज्यों के बीच सीटों के मौजूदा बंटवारे को सुरक्षित रखने की मांग की गई थी।
दक्षिण भारत के राज्यों की मुख्य चिंता यह है कि अगर भविष्य में लोकसभा सीटों का पुनर्विन्यास मुख्य रूप से आबादी के आधार पर हुआ, तो जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों की संसद में हिस्सेदारी घट सकती है।
अमित शाह से मुलाकात के बाद क्या कहा विजय ने?
20 अगस्त को महाबलीपुरम में दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक हुई, जिसकी अध्यक्षता अमित शाह ने की। बैठक में विजय समेत दक्षिण भारत के कई राज्यों के मुख्यमंत्री और वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।
इस बैठक में विजय ने पहले की तरह सीधे तौर पर लोकसभा की 543 सीटों को फ्रीज करने की मांग दोहराने के बजाय एक अलग बात पर जोर दिया।
उन्होंने केंद्र से कानूनी आश्वासन देने की मांग की कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के कारण किसी राज्य की संसद में मौजूदा हिस्सेदारी कम नहीं होनी चाहिए।
यही बदलाव अब राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया है।
DMK ने क्यों लगाया यू-टर्न का आरोप?
विपक्षी DMK का कहना है कि विधानसभा में सरकार ने जिस स्पष्ट तरीके से 543 लोकसभा सीटों को बनाए रखने की मांग की थी, अमित शाह की मौजूदगी वाली बैठक में विजय ने उस मांग को उसी रूप में नहीं दोहराया।
DMK नेताओं ने सवाल उठाया कि कुछ ही दिनों में मुख्यमंत्री के रुख में यह बदलाव क्यों आया। पार्टी ने इसे विजय का ‘यू-टर्न’ बताया है।
तमिलनाडु विधानसभा में भी इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ TVK और DMK के बीच तीखी बहस हुई।
TVK का जवाब क्या है?
TVK ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है। पार्टी की ओर से कहा गया कि सरकार का परिसीमन पर रुख नहीं बदला है।
TVK के मुताबिक, बैठक का एजेंडा सिर्फ तमिलनाडु नहीं बल्कि पूरे दक्षिण भारत से जुड़े कई मुद्दों पर था। पार्टी के नेताओं ने कहा कि सरकार की प्राथमिकता तमिलनाडु और दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी को सुरक्षित रखना है।
यानी TVK इसे रुख बदलने के बजाय रणनीतिक तरीके से अपनी मांग रखने के रूप में देख रही है।
असली अंतर कहां है?
पूरे विवाद को आसान भाषा में समझें तो पहले विजय सरकार की मांग थी—
543 लोकसभा सीटें और मौजूदा राज्यवार सीट बंटवारा बरकरार रहे।
अब विजय का जोर है—
परिसीमन हो तो भी किसी राज्य की संसद में मौजूदा हिस्सेदारी प्रतिशत के हिसाब से कम न हो।
यही शब्दों और मांग के तरीके में आया अंतर विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका दे रहा है।
सिर्फ परिसीमन ही मुद्दा नहीं
अमित शाह के साथ बैठक में विजय ने तमिलनाडु से जुड़े दूसरे मुद्दे भी उठाए। इनमें NEET से राज्य को छूट, कावेरी जल विवाद और ऑनलाइन दवाओं तथा नशीली दवाओं की बिक्री पर नियंत्रण जैसे विषय शामिल थे।
इससे संकेत मिलता है कि मुख्यमंत्री केंद्र के साथ टकराव के बजाय बातचीत के जरिए राज्य के मुद्दों पर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।
क्या इसे विजय का यू-टर्न माना जाए?
फिलहाल इसे सीधे तौर पर पूर्ण यू-टर्न कहना जल्दबाजी होगी।
यह जरूर है कि विजय की भाषा और मांग का फोकस बदला है। विधानसभा के प्रस्ताव में 543 सीटों को फ्रीज करने की बात प्रमुख थी, जबकि दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद में उन्होंने मौजूदा प्रतिनिधित्व की हिस्सेदारी सुरक्षित रखने पर जोर दिया।
लेकिन TVK लगातार कह रही है कि इसका अंतिम उद्देश्य वही है—तमिलनाडु और दक्षिणी राज्यों को परिसीमन के कारण राजनीतिक नुकसान से बचाना।
आगे क्या होगा?
परिसीमन को लेकर अभी सबसे बड़ा सवाल यही है कि केंद्र सरकार दक्षिणी राज्यों को किस तरह का कानूनी या राजनीतिक आश्वासन देती है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने भी 543 लोकसभा सीटों और मौजूदा राज्यवार बंटवारे को अगले 25 वर्षों तक बनाए रखने की मांग का समर्थन किया है।
इससे साफ है कि परिसीमन का मुद्दा केवल तमिलनाडु की राजनीति तक सीमित नहीं रहने वाला। यह आने वाले समय में दक्षिण बनाम केंद्र की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है।
अमित शाह से मुलाकात के बाद विजय के परिसीमन संबंधी बयान ने तमिलनाडु की राजनीति में नई बहस जरूर शुरू कर दी है। क्या यह रुख में नरमी है या सिर्फ रणनीति में बदलाव? इसका जवाब आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम से ही स्पष्ट होगा।
फिलहाल इतना जरूर है कि विजय ने 543 सीटों को फ्रीज करने की सीधी मांग के बजाय राज्यों की मौजूदा संसदीय हिस्सेदारी सुरक्षित रखने पर जोर दिया है। इसी अंतर को DMK ‘यू-टर्न’ बता रही है, जबकि TVK इसे अपनी मूल मांग की निरंतरता मान रही है।
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