NATO Article 5 पर इजरायल की नजर, तुर्की-इजरायल तनाव के बीच भारत के लिए क्यों अहम है यह चर्चा?

इजरायल और NATO सदस्य तुर्की के बीच सीरिया को लेकर तनाव लगातार बढ़ रहा है। इसी बीच इजरायल के अखबार Israel Hayom में प्रकाशित एक विश्लेषण में NATO के Article 5 की भौगोलिक सीमा को लेकर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अगर तुर्की अपनी सेना को तुर्की की सीमा से बाहर, जैसे सीरिया में तैनात करता है, तो उस सैन्य मौजूदगी को अपने-आप NATO की सामूहिक सुरक्षा की गारंटी मिलने की बात स्पष्ट नहीं है।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि यह इजरायली मीडिया में प्रकाशित विश्लेषण है, NATO या इजरायल सरकार का आधिकारिक फैसला नहीं। किसी सैन्य हमले की स्थिति में NATO की प्रतिक्रिया परिस्थितियों और सदस्य देशों के राजनीतिक फैसलों पर निर्भर करेगी।
सीरिया बना इजरायल और तुर्की के बीच तनाव का केंद्र
इजरायल और तुर्की के बीच सबसे बड़ा तनाव फिलहाल सीरिया को लेकर है। इजरायल को आशंका है कि तुर्की सीरिया में अपना सैन्य प्रभाव बढ़ा रहा है। इसी बीच इजरायल ने उत्तरी सीरिया के अबू अल-दुहूर एयरबेस पर हवाई हमला किया।
इजरायल का कहना था कि वहां तुर्की की सेना की संभावित तैनाती को लेकर सुरक्षा चिंता थी। दूसरी ओर, सीरियाई अधिकारियों के अनुसार वहां तुर्की की सैन्य तैनाती नहीं थी और एक तकनीकी टीम रनवे तथा कंट्रोल टावर की मरम्मत के लिए गई थी।
अमेरिका के सीरिया मामलों के विशेष दूत और तुर्की में अमेरिकी राजदूत टॉम बैरक ने इस हमले को तनाव बढ़ाने वाला कदम बताया और इजरायल, तुर्की तथा सीरिया के बीच टकराव रोकने के लिए एक डी-एस्केलेशन व्यवस्था की जरूरत बताई है।
Article 5 आखिर है क्या?
NATO का Article 5 सामूहिक रक्षा के सिद्धांत से जुड़ा है। इसके तहत NATO सदस्य देशों पर होने वाले कुछ सशस्त्र हमलों को सामूहिक सुरक्षा के संदर्भ में देखा जाता है।
लेकिन Article 5 की सीमा समझने के लिए Article 6 भी महत्वपूर्ण है। NATO की आधिकारिक संधि के अनुसार Article 5 के लिए भौगोलिक दायरा निर्धारित है, जिसमें NATO सदस्य देशों के यूरोप और उत्तरी अमेरिका स्थित क्षेत्र तथा विशेष रूप से तुर्की का क्षेत्र शामिल है। संधि कुछ परिस्थितियों में सदस्य देशों की सेनाओं, जहाजों और विमानों पर हमलों को भी कवर करती है।
यही भौगोलिक सीमा इस पूरे विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है।
इजरायल के विश्लेषण में क्या दावा किया गया?
Israel Hayom के विश्लेषण में यह तर्क दिया गया है कि अगर तुर्की की सेना सीरिया में तैनात होती है, तो सीरिया की जमीन तुर्की का क्षेत्र नहीं बन जाती। इसलिए वहां मौजूद तुर्की सैनिकों पर हमले की स्थिति में Article 5 का इस्तेमाल स्वतः होगा, ऐसा मानना सही नहीं होगा।
इसका मतलब यह नहीं है कि NATO निश्चित रूप से तुर्की का साथ नहीं देगा। बल्कि सवाल यह है कि क्या Article 5 अपने आप लागू होगा या नहीं, और अगर ऐसी स्थिति आती है तो NATO सदस्य देश किस तरह प्रतिक्रिया देंगे।
अब भारत का नाम क्यों आ रहा है?
इस चर्चा को भारत के संदर्भ से जोड़ने की वजह तुर्की और पाकिस्तान के बीच बढ़ते सैन्य संबंध हैं। हाल में तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक रक्षा समझौता हुआ है, जिसे तुर्की के विदेश मंत्री ने NATO के Article 5 जैसे सामूहिक रक्षा तंत्र वाला बताया था।
इसी पृष्ठभूमि में नवभारत टाइम्स के विश्लेषण में सवाल उठाया गया है कि अगर भविष्य में भारत-पाकिस्तान के बीच कोई सैन्य संघर्ष होता है और तुर्की पाकिस्तान में अपने सैनिक या सैन्य संसाधन तैनात करता है, तो उस स्थिति में NATO Article 5 का दायरा कितना प्रभावी होगा।
लेकिन इसे भारत को इजरायल की ओर से मिला कोई आधिकारिक सैन्य या कानूनी रास्ता नहीं कहा जा सकता। यह मौजूदा घटनाक्रम और NATO संधि की व्याख्या पर आधारित रणनीतिक विश्लेषण है।
अबू अल-दुहूर एयरबेस पर हमला क्यों महत्वपूर्ण है?
अबू अल-दुहूर पर इजरायली हमला इस बहस को इसलिए भी महत्वपूर्ण बनाता है क्योंकि इजरायल ने तुर्की की संभावित सैन्य मौजूदगी को लेकर पहले ही कार्रवाई की।
Reuters के अनुसार, इजरायल का कहना था कि एयरबेस पर तुर्की सैनिकों की संभावित तैनाती सुरक्षा के लिए खतरा हो सकती थी। तुर्की ने इन दावों को खारिज किया और कहा कि सीरिया में उसका सहयोग मुख्य रूप से प्रशिक्षण और विशेषज्ञता के आदान-प्रदान तक सीमित था।
इस घटनाक्रम से साफ है कि सीरिया अब सिर्फ इजरायल और सीरिया के बीच का मुद्दा नहीं रह गया है। यहां इजरायल, तुर्की, सीरिया और अमेरिका के हित एक-दूसरे से टकरा रहे हैं।
क्या NATO और इजरायल सीधे आमने-सामने आ सकते हैं?
फिलहाल ऐसी स्थिति नहीं है। इजरायल और तुर्की के बीच सीधी जंग भी नहीं हुई है। लेकिन अगर सीरिया में तुर्की की सैन्य मौजूदगी बढ़ती है और इजरायल उस मौजूदगी को अपने लिए खतरा मानकर हमला करता है, तो मामला बेहद संवेदनशील हो सकता है।
NATO की आधिकारिक संधि Article 5 को Article 6 में निर्धारित भौगोलिक दायरे से जोड़ती है। साथ ही Article 5 का इस्तेमाल होने पर प्रत्येक सदस्य देश अपनी ओर से वह कार्रवाई करता है जिसे वह आवश्यक समझता है। इसलिए इसे ऐसा नियम नहीं माना जा सकता कि किसी भी परिस्थिति में सभी NATO देश स्वतः युद्ध में उतर जाएंगे।
आगे क्या?
सीरिया में तुर्की की भूमिका और इजरायल की सुरक्षा चिंताओं के बीच आने वाले दिनों में तनाव और बढ़ सकता है। अमेरिका पहले ही तीनों पक्षों के बीच सैन्य टकराव रोकने की कोशिश कर रहा है।
वहीं भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तुर्की-पाकिस्तान के बढ़ते रक्षा संबंध और NATO सदस्य के रूप में तुर्की की स्थिति दक्षिण एशिया के किसी संभावित संकट में नई रणनीतिक जटिलताएं पैदा कर सकती है।
NATO Article 5 को लेकर सामने आया यह ‘लूपहोल’ फिलहाल एक रणनीतिक और कानूनी बहस है, कोई आधिकारिक NATO घोषणा नहीं। Article 6 NATO की सामूहिक रक्षा का भौगोलिक दायरा तय करता है, लेकिन किसी वास्तविक सैन्य संकट में NATO की प्रतिक्रिया केवल एक कानूनी धारा पढ़कर तय नहीं होगी।
सीरिया में इजरायल और तुर्की के बीच बढ़ता तनाव इस बहस को जरूर गंभीर बना रहा है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर दोनों देशों की सेनाएं सीधे आमने-सामने आती हैं, तो अमेरिका और NATO किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं और इसका असर पूरे मध्य-पूर्व के साथ-साथ भारत-पाकिस्तान की रणनीतिक स्थिति पर कितना पड़ता है।
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