
भारत की अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8% की मजबूत GDP ग्रोथ दर्ज की है। यह आंकड़ा भारतीय रिजर्व बैंक के 7% के अनुमान से भी ज्यादा रहा। सरकार ने इसे अर्थव्यवस्था की मजबूती और वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत के बेहतर प्रदर्शन के तौर पर पेश किया है।
लेकिन इसी मजबूत आंकड़े के बीच पूर्व RBI गवर्नर रघुराम राजन ने कुछ ऐसे सवाल उठाए हैं, जिनसे GDP की इस शानदार तस्वीर के दूसरे पहलू पर बहस शुरू हो गई है।
7.8% की ग्रोथ, लेकिन सवाल रोजगार का
रघुराम राजन का सबसे बड़ा सवाल रोजगार को लेकर है। उनका तर्क है कि अगर अर्थव्यवस्था इतनी तेज गति से बढ़ रही है, तो युवाओं के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छी नौकरियां क्यों नहीं बन रही हैं?
राजन ने GDP के आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए यह भी पूछा कि अगर आर्थिक गतिविधियां इतनी मजबूत हैं तो निजी निवेश में अपेक्षित तेजी क्यों नहीं दिखाई दे रही और विदेशी निवेश यानी FDI बड़े पैमाने पर क्यों नहीं आ रहा।
यही वजह है कि अब बहस सिर्फ इस बात पर नहीं है कि GDP कितनी बढ़ी, बल्कि इस पर भी है कि इस ग्रोथ का फायदा आम लोगों तक कितना पहुंच रहा है।
आखिर 7.8% GDP Growth आई कहां से?
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में भारत की वास्तविक GDP वृद्धि दर 7.8% रही। इस दौरान मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर ने बेहतर प्रदर्शन किया। निवेश से जुड़े सकल स्थायी पूंजी निर्माण में भी तेज वृद्धि दर्ज की गई।
यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछली तिमाही में GDP ग्रोथ का संशोधित आंकड़ा 8.6% रहा था। यानी तिमाही आधार पर थोड़ी गिरावट के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार मजबूत बनी हुई है।
फिर GDP के आंकड़ों पर सवाल क्यों?
इस बहस का एक दूसरा पहलू GDP की नई गणना पद्धति है।
सरकार ने हाल में GDP की नई सीरीज जारी की है, जिसमें 2022-23 को नया बेस ईयर बनाया गया है। इसके साथ कीमतों और आर्थिक गतिविधियों को मापने के लिए ज्यादा विस्तृत डेटा का इस्तेमाल किया गया है।
सांख्यिकी सचिव सौरभ गर्ग ने स्पष्ट किया है कि आंकड़ों में हुए बदलाव नई जानकारी और नई methodology की वजह से हैं, न कि किसी तरह की मनमानी के कारण। सरकार के मुताबिक नई व्यवस्था में Producer Price Index समेत ज्यादा व्यापक price data का इस्तेमाल किया गया है और price deflators की संख्या भी करीब 180 से बढ़ाकर 300 से ज्यादा की गई है।
सरकार ने आंकड़ों का किया बचाव
GDP के आंकड़ों पर सवाल उठने के बाद सरकार ने साफ किया है कि 7.8% की ग्रोथ का आंकड़ा सही है और इसमें किसी तरह की जानबूझकर की गई हेरफेर नहीं हुई है।
सरकार का कहना है कि पुराने आंकड़ों में संशोधन सामान्य सांख्यिकीय प्रक्रिया का हिस्सा है और नई GDP सीरीज में बेहतर डेटा स्रोतों को शामिल किया गया है।
यानी फिलहाल तस्वीर दो हिस्सों में बंटी हुई है—एक तरफ सरकार के मजबूत GDP आंकड़े हैं, तो दूसरी तरफ अर्थशास्त्रियों के सवाल कि क्या GDP की तेज रफ्तार वास्तव में रोजगार और निजी निवेश में भी दिखाई दे रही है?
GDP बढ़ना ही काफी है या उसका असर भी दिखना चाहिए?
यही इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
किसी देश की GDP बढ़ना निश्चित तौर पर सकारात्मक संकेत है, लेकिन आर्थिक विकास का असर तब ज्यादा व्यापक माना जाता है जब उससे नौकरियां, आय, निवेश और उत्पादकता भी बढ़ें।
भारत के सामने आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार देने की चुनौती है। ऐसे में सिर्फ GDP की रफ्तार नहीं, बल्कि यह देखना भी जरूरी होगा कि आर्थिक विकास कितने नए और अच्छे रोजगार पैदा कर रहा है।
इस बहस में फिलहाल तीन बड़े सवाल
- 7.8% GDP Growth का लाभ रोजगार में कितनी तेजी से दिखाई देगा?
- निजी कंपनियां और उद्योग बड़े पैमाने पर निवेश कब बढ़ाएंगे?
- तेज आर्थिक विकास का फायदा युवाओं और आम परिवारों की आय तक कितना पहुंचेगा?
असली सवाल आंकड़े नहीं, उनका असर है
भारत की 7.8% GDP ग्रोथ निश्चित रूप से एक मजबूत आर्थिक संकेत है। लेकिन रघुराम राजन की आपत्ति ने एक जरूरी बहस को जन्म दिया है—क्या तेज GDP Growth अपने आप में पर्याप्त है?
सरकार आंकड़ों और नई गणना पद्धति का बचाव कर रही है, जबकि आलोचक रोजगार और निवेश जैसे वास्तविक आर्थिक संकेतकों पर ध्यान देने की बात कर रहे हैं।
आने वाले महीनों में रोजगार, निजी निवेश और FDI के आंकड़े यह बताने में मदद करेंगे कि 7.8% की यह रफ्तार भारतीय अर्थव्यवस्था के जमीन पर कितनी मजबूती से उतर रही है।
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