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Wednesday, October 14, 2026
बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी ने शिक्षा नीति और रोजगार को लेकर केंद्र सरकार से सवाल किए
मुरली मनोहर जोशी ने शिक्षा, पेपर लीक और युवाओं के रोजगार को लेकर केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाए।
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कॉलेज तो खोल रहे हैं, नौकरी कहां है?’ मुरली मनोहर जोशी ने मोदी सरकार की शिक्षा नीति पर उठाए सवाल

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भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की शिक्षा नीति और विकास की प्राथमिकताओं पर कई गंभीर सवाल उठाए हैं। अमर उजाला को दिए एक विस्तृत इंटरव्यू में जोशी ने पेपर लीक, बेरोजगारी, शिक्षा बजट, सरकारी स्कूलों के बंद होने, शिक्षा के निजीकरण और ‘विकसित भारत’ की अवधारणा पर अपनी चिंता जाहिर की।

जोशी ने सबसे बड़ा सवाल शिक्षा और रोजगार के बीच बढ़ती दूरी को लेकर उठाया। उन्होंने कहा कि अगर देश में लगातार कॉलेज और विश्वविद्यालय खुल रहे हैं, लेकिन वहां से पढ़कर निकलने वाले युवाओं के लिए पर्याप्त नौकरियां नहीं हैं, तो शिक्षा व्यवस्था की दिशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। उन्होंने पूछा कि “आप कॉलेज बना रहे हैं, लेकिन वहां से निकलने वाले युवाओं के लिए नौकरियां कहां हैं?”

पेपर लीक को सिर्फ परीक्षा व्यवस्था की समस्या नहीं मानते जोशी

मुरली मनोहर जोशी ने बार-बार होने वाले पेपर लीक को केवल परीक्षा प्रणाली की नाकामी मानने से इनकार किया। उनके मुताबिक इसकी जड़ समाज और शासन में बढ़ते भ्रष्टाचार से जुड़ी है।

उन्होंने सवाल किया कि वाजपेयी सरकार के समय पेपर लीक की ऐसी घटनाएं क्यों नहीं होती थीं? जोशी का तर्क है कि जब युवाओं को अलग-अलग क्षेत्रों में पैसे और भ्रष्टाचार का प्रभाव दिखाई देता है, तो उसका असर उनके सोचने के तरीके पर भी पड़ता है।

उन्होंने यह भी कहा कि अगर नियुक्तियों में भ्रष्टाचार और रिश्वत की बातें सामने आती रहें, तो छात्रों से पूरी तरह ईमानदार व्यवस्था की उम्मीद करना मुश्किल हो जाता है।

‘शिक्षा को रोजगार से जोड़ना जरूरी’

जोशी ने शिक्षा व्यवस्था में सबसे बड़ी जरूरत शिक्षा और रोजगार के बीच सीधा संबंध बनाने की बताई। उनका कहना है कि सिर्फ डिग्री हासिल करना पर्याप्त नहीं है, शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे व्यक्ति के लिए आर्थिक अवसर पैदा हों।

उन्होंने अपने इंटरव्यू में उच्च शिक्षित युवाओं के कम वेतन वाली या संविदा वाली नौकरियों में काम करने का उदाहरण भी दिया। उनका कहना था कि अगर एमए और पीएचडी जैसे उच्च शिक्षित लोग अपनी योग्यता से काफी नीचे के रोजगार करने को मजबूर हैं, तो यह शिक्षा और रोजगार की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

शिक्षा बजट और सरकारी स्कूलों पर भी सवाल

पूर्व शिक्षा मंत्री ने शिक्षा को सरकार की प्राथमिकता में और ऊपर रखने की जरूरत बताई। उन्होंने दावा किया कि प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों पर बजट प्राथमिकता कम हुई है, जबकि सड़क और सड़क परिवहन पर खर्च बढ़ा है। उनके मुताबिक सिर्फ सड़कें और इमारतें बनाना ही विकास नहीं है; देश को ऐसे शिक्षित और प्रशिक्षित मानव संसाधन भी चाहिए जो इस विकास को आगे बढ़ा सकें।

सरकारी स्कूलों के बंद होने पर भी जोशी ने सवाल उठाया। उनका कहना है कि अगर किसी स्कूल में छात्रों की संख्या कम हो रही है तो उसे बंद करने के बजाय पहले यह पता लगाया जाना चाहिए कि बच्चे वहां क्यों नहीं आ रहे। उन्होंने बेहतर सुविधाएं और पर्याप्त शिक्षकों की व्यवस्था करने की वकालत की।

शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ जोशी

मुरली मनोहर जोशी ने शिक्षा के बढ़ते निजीकरण पर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि शिक्षा को पूरी तरह मुनाफे का कारोबार नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने समान और मुफ्त शिक्षा की जरूरत पर जोर देते हुए ‘Neighbourhood School System’ यानी बच्चों को उनके आसपास के स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की अवधारणा का समर्थन किया।

उनका तर्क है कि शुरुआती शिक्षा में अमीर और गरीब बच्चों के बीच बड़ा अंतर नहीं होना चाहिए और शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल नौकरी के लिए मानव संसाधन तैयार करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के संपूर्ण विकास पर भी होना चाहिए।

NEP 2020 पर भी अपनी राय रखी

जोशी ने नई शिक्षा नीति यानी NEP 2020 को लेकर भी अपनी पुरानी सोच सामने रखी। उन्होंने कहा कि शिक्षा नीति केवल इसलिए नहीं बदली जानी चाहिए कि उसे पिछली सरकार के समय बनाया गया था। उनके मुताबिक वाजपेयी सरकार के समय भी पुरानी शिक्षा नीति का अध्ययन करके जरूरी बदलाव करने पर जोर दिया गया था।

उन्होंने नई शिक्षा नीति तैयार करने की प्रक्रिया और नीति आयोग की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए और शिक्षा की योजना में रोजगार की जरूरतों को पर्याप्त महत्व देने की बात कही।

‘विकसित भारत’ पर भी जोशी का सवाल

जोशी ने ‘विकसित भारत’ के नारे की परिभाषा पर भी सवाल उठाया। उनके मुताबिक विकास को केवल आर्थिक आंकड़ों, आधुनिक सुविधाओं और भौतिक ढांचे से नहीं मापा जाना चाहिए। मानव मूल्यों, समानता और प्रकृति के साथ संतुलन को भी विकास का हिस्सा माना जाना चाहिए।

सरकार का पक्ष: रोजगार के लिए कई योजनाएं

जोशी की आलोचनाओं के बीच केंद्र सरकार का कहना है कि रोजगार और रोजगार-योग्यता बढ़ाना उसकी प्राथमिकताओं में शामिल है। सरकार ने PLI, PMEGP, MGNREGS, DDU-GKY, DAY-NRLM, Start-up India और MUDRA जैसी योजनाओं को रोजगार और स्वरोजगार बढ़ाने के लिए गिनाया है।

हाल ही में श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने बताया कि 15 जुलाई 2026 तक National Career Service (NCS) पोर्टल पर 17.68 लाख से अधिक सक्रिय रिक्तियां उपलब्ध थीं। मंत्रालय के अनुसार पोर्टल पर स्थापना के बाद से 10.05 करोड़ से ज्यादा रिक्तियां जुटाई गई हैं और 6.64 करोड़ से ज्यादा नौकरी चाहने वालों ने पंजीकरण कराया है।

हालांकि, ये आंकड़े उपलब्ध रिक्तियों और रोजगार सेवाओं की स्थिति बताते हैं; वे जोशी द्वारा उठाए गए शिक्षा की गुणवत्ता, योग्यता के अनुरूप रोजगार और पेपर लीक जैसे सवालों का सीधे जवाब नहीं देते।

जोशी की बात इसलिए चर्चा में

मुरली मनोहर जोशी बीजेपी के वरिष्ठतम नेताओं में शामिल हैं और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री रह चुके हैं। ऐसे समय में जब देश में प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक और युवाओं के रोजगार को लेकर छात्र आंदोलनों की चर्चा चल रही है, उनकी ओर से अपनी ही पार्टी की केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मुरली मनोहर जोशी का सवाल सिर्फ “नौकरियां कहां हैं?” तक सीमित नहीं है। उनकी पूरी टिप्पणी का केंद्र यह है कि शिक्षा, रोजगार और विकास को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। कॉलेज और विश्वविद्यालय बढ़ाने के साथ युवाओं के लिए रोजगार, सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता, शिक्षकों की उपलब्धता और परीक्षा व्यवस्था में भरोसा कायम करना भी जरूरी है।

दूसरी ओर, केंद्र सरकार रोजगार के लिए कई योजनाओं और NCS जैसे प्लेटफॉर्म के आंकड़े सामने रखती है। ऐसे में असली चुनौती यह होगी कि शिक्षा हासिल करने वाले युवाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप स्थायी और सम्मानजनक रोजगार कितनी तेजी से मिल पाता है।

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