सऊदी अरब हूती विद्रोहियों से राजधानी रियाद की हिफ़ाज़त क्यों नहीं कर पा रहा है?

रियाद: सऊदी अरब के पास आधुनिक हथियार, मजबूत आर्थिक संसाधन और अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश का सैन्य सहयोग है। इसके बावजूद यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से किए जा रहे मिसाइल और ड्रोन हमले उसकी सुरक्षा व्यवस्था के सामने चुनौती बने हुए हैं। सवाल यह है कि आखिर दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में शामिल सऊदी अरब अपनी राजधानी रियाद और महत्वपूर्ण ठिकानों को इन हमलों से पूरी तरह सुरक्षित क्यों नहीं रख पा रहा है?
हालिया घटनाओं ने इस सवाल को और महत्वपूर्ण बना दिया है। हूती विद्रोहियों की बढ़ती सैन्य क्षमता, ईरान से मिलने वाले समर्थन और सऊदी अरब की रक्षा व्यवस्था की सीमाओं ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं।
ईरान के समर्थन से बढ़ी हूतियों की ताकत
यमन के हूती विद्रोही लंबे समय से सऊदी अरब के लिए सुरक्षा चुनौती बने हुए हैं। ईरान पर हूतियों को हथियार, तकनीकी सहायता और सैन्य सहयोग देने के आरोप लगते रहे हैं। इस समर्थन से हूती विद्रोहियों की मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं में बढ़ोतरी हुई है।
लंबी दूरी तक मार करने वाले हथियारों की मदद से वे यमन से दूर स्थित सऊदी अरब के महत्वपूर्ण ठिकानों को भी निशाना बनाने की क्षमता रखते हैं। इनमें हवाई अड्डे, ऊर्जा प्रतिष्ठान और शहरी बुनियादी ढांचे जैसे संवेदनशील स्थान शामिल हैं।
हालांकि, हूतियों की सैन्य क्षमता का आकलन करते समय ईरान की भूमिका और उनके अपने स्तर पर विकसित किए गए हथियारों के बीच अंतर को समझना भी जरूरी है।
आधुनिक हथियार होने के बावजूद सुरक्षा में मुश्किल क्यों?
सऊदी अरब ने अपनी रक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए अत्याधुनिक मिसाइल रोधी प्रणालियों और दूसरे सैन्य उपकरणों पर भारी निवेश किया है। लेकिन किसी देश के पास आधुनिक हथियार होना और हर हमले को रोक पाना दो अलग-अलग बातें हैं।
मिसाइल और ड्रोन हमलों को रोकने में कई चुनौतियां सामने आती हैं:
- एक साथ कई हमले: अलग-अलग दिशाओं से आने वाले मिसाइलों और ड्रोन को पहचानना और रोकना रक्षा प्रणाली पर दबाव बढ़ाता है।
- कम लागत वाले ड्रोन: अपेक्षाकृत सस्ते ड्रोन के मुकाबले महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल करना आर्थिक और रणनीतिक चुनौती बन सकता है।
- बड़े क्षेत्र की सुरक्षा: हवाई अड्डों, तेल प्रतिष्ठानों, सैन्य ठिकानों और रिहायशी इलाकों की एक साथ सुरक्षा करना आसान नहीं है।
- इंटरसेप्टर की उपलब्धता: लगातार हमलों की स्थिति में मिसाइलों को हवा में नष्ट करने के लिए इस्तेमाल होने वाले इंटरसेप्टर का भंडार बनाए रखना जरूरी होता है।
यही कारण है कि मजबूत वायु रक्षा व्यवस्था भी हर हमले को रोकने की गारंटी नहीं देती।
सऊदी अरब की सैन्य ताकत की असली चुनौती
सऊदी अरब की सैन्य शक्ति का बड़ा हिस्सा आधुनिक हथियारों और विदेशी रक्षा तकनीक पर आधारित है। लेकिन जटिल सैन्य अभियानों में प्रशिक्षण, युद्ध का अनुभव, खुफिया जानकारी और अलग-अलग रक्षा प्रणालियों के बीच तालमेल भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
यमन का भूगोल और वहां लंबे समय से जारी संघर्ष हूती विद्रोहियों को मुकाबला जारी रखने में मदद करता रहा है। ऐसे संघर्षों में केवल हवाई हमलों या आधुनिक हथियारों के जरिए किसी विरोधी समूह को पूरी तरह खत्म करना कठिन हो सकता है।
सऊदी अरब के सामने चुनौती केवल मिसाइलों को रोकने की नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों को नियंत्रित करने की भी है जिनके कारण हूती विद्रोही लगातार हमले करने में सक्षम बने हुए हैं।
रियाद और हवाई अड्डे क्यों बन रहे हैं निशाना?
राजधानी रियाद और प्रमुख हवाई अड्डे सऊदी अरब के लिए रणनीतिक तथा आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। इन स्थानों पर हमला होने से आम लोगों में भय पैदा हो सकता है, उड़ानों पर असर पड़ सकता है और देश की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठ सकते हैं।
हवाई अड्डों को निशाना बनाना केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं रहता। इससे अंतरराष्ट्रीय यात्रा, व्यापार और निवेश के माहौल पर भी असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के विश्लेषण के अनुसार, इस तरह के हमले विरोधी पक्ष पर राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा भी हो सकते हैं। हालांकि, हर हमले के पीछे का उद्देश्य संबंधित पक्षों के बयानों और उपलब्ध सबूतों के आधार पर ही समझा जाना चाहिए।
यमन संघर्ष की जड़ें एक दशक से भी पुरानी
सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच टकराव को समझने के लिए यमन के गृहयुद्ध की पृष्ठभूमि देखना जरूरी है।
हूती विद्रोहियों ने 2014 में यमन की राजधानी सना पर नियंत्रण कर लिया था। इसके बाद 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के समर्थन में सैन्य अभियान शुरू किया।
लंबे समय तक चले इस संघर्ष में हवाई हमले, जमीनी लड़ाई और क्षेत्रीय शक्तियों की भागीदारी देखने को मिली। इसका सबसे गंभीर असर यमन की आम आबादी पर पड़ा, जहां विस्थापन, खाद्य संकट और मानवीय सहायता की कमी जैसी समस्याएं पैदा हुईं।
2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से हुए संघर्षविराम ने हिंसा कम करने में मदद की थी, लेकिन इससे विवाद का स्थायी समाधान नहीं निकला। इसके बाद भी दोनों पक्षों के बीच तनाव बना रहा और क्षेत्रीय संघर्षों ने स्थिति को और जटिल बनाया।
सऊदी अरब के सामने आगे क्या विकल्प हैं?
सऊदी अरब के सामने एक ओर अपनी वायु रक्षा और खुफिया व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत है, तो दूसरी ओर व्यापक क्षेत्रीय युद्ध से बचने की चुनौती भी है।
हूती विद्रोहियों के खिलाफ बड़े सैन्य अभियान से संघर्ष का दायरा बढ़ सकता है और ईरान सहित दूसरे क्षेत्रीय पक्षों की भागीदारी का खतरा पैदा हो सकता है। दूसरी ओर, लगातार हमलों को नजरअंदाज करना भी सऊदी अरब के लिए आसान नहीं होगा।
ऐसे में रक्षा सहयोग, मिसाइल रोधी प्रणालियों को मजबूत करना, महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा और कूटनीतिक प्रयास उसके सामने मौजूद प्रमुख विकल्प हैं।
👉 यह भी पढ़ें:





