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Wednesday, October 14, 2026
CJI सूर्यकांत ने क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन पर विकासशील देशों के पक्ष में बात रखी
CJI सूर्यकांत ने Commonwealth की बैठक में क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन को न्यायपूर्ण बनाने की जरूरत पर जोर दिया।
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CJI सूर्यकांत बोले- खुद 200 साल कोयला जलाया, अब विकासशील देशों से तुरंत क्लीन एनर्जी की उम्मीद क्यों?

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भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने लंदन में राष्ट्रमंडल (Commonwealth) की बैठक में क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन को लेकर विकसित देशों की नीतियों पर अहम सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जो औद्योगिक देश करीब दो शताब्दियों तक कोयले और तेल के इस्तेमाल से अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत करते रहे, वे अब औद्योगीकरण की प्रक्रिया में आगे बढ़ रहे देशों से कुछ दशकों में ही तेजी से नवीकरणीय ऊर्जा अपनाने की उम्मीद कर रहे हैं।

विकासशील देशों पर नहीं डाला जा सकता पूरा बोझ

CJI सूर्यकांत ने लंदन के Marlborough House में आयोजित High-Level Commonwealth Policy Dialogue on Climate Justice को संबोधित करते हुए कहा कि जलवायु संकट के दो पहलू हैं—एक तरफ जलवायु परिवर्तन से अलग-अलग देशों पर पड़ने वाला असमान असर और दूसरी तरफ स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव की लागत का असमान बोझ।

उन्होंने कहा कि जो देश अभी औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया में हैं, उनसे तेजी से अक्षय ऊर्जा अपनाने की उम्मीद की जा रही है और धीमी गति के लिए उनकी आलोचना भी होती है। दूसरी तरफ जिन विकसित देशों ने आज संक्रमण की वकालत की है, उन्होंने अपनी आर्थिक ताकत बनाने में करीब 200 साल तक कोयले और तेल का इस्तेमाल किया।

CJI ने उठाया ‘क्लाइमेट जस्टिस’ का सवाल

जस्टिस सूर्यकांत ने जोर दिया कि दुनिया को स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ना जरूर चाहिए, लेकिन यह बदलाव न्यायपूर्ण और समान जिम्मेदारी के सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए। विकासशील देशों की अलग-अलग आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को नजरअंदाज करके एक जैसा लक्ष्य थोपना उचित नहीं होगा।

उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की जरूरत और ऊर्जा संक्रमण की गति के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।

लिथियम, कोबाल्ट और कॉपर का भी जिक्र

CJI ने सिर्फ ऊर्जा नीति तक अपनी बात सीमित नहीं रखी। उन्होंने क्लीन एनर्जी के लिए जरूरी खनिजों के खनन से जुड़े पर्यावरणीय और सामाजिक नुकसान पर भी चिंता जताई।

सौर ऊर्जा, बैटरी और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसी तकनीकों के विस्तार के लिए कॉपर, कोबाल्ट और लिथियम जैसे खनिजों की मांग बढ़ रही है। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि स्वच्छ भविष्य बनाने की कोशिश कहीं ऐसे समुदायों के लिए नई पर्यावरणीय मुश्किलें पैदा न कर दे, जहां इन खनिजों का खनन किया जाता है।

‘ग्रीन ट्रांजिशन’ के साथ होनी चाहिए बराबरी

CJI के मुताबिक, क्लीन एनर्जी की ओर बदलाव जरूरी है, लेकिन इसकी कीमत कौन चुकाएगा, यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उनका संदेश था कि वैश्विक जलवायु कार्रवाई में ऐतिहासिक जिम्मेदारियों और देशों की वर्तमान आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

CJI सूर्यकांत की बातों की मुख्य बातें

  • विकसित देशों ने लंबे समय तक कोयला और तेल आधारित विकास किया।
  • अब विकासशील देशों से तेजी से नवीकरणीय ऊर्जा अपनाने की अपेक्षा की जा रही है।
  • क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन का बोझ समान और न्यायपूर्ण तरीके से बांटा जाना चाहिए।
  • जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान का असर सभी देशों पर समान नहीं है।
  • लिथियम, कोबाल्ट और कॉपर के खनन से जुड़े पर्यावरणीय नुकसान पर भी ध्यान जरूरी है।
  • ऊर्जा संक्रमण ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे नए सामाजिक और पर्यावरणीय संकट पैदा हों।

भारत के लिए क्यों अहम है यह बयान?

भारत जैसे विकासशील देश के लिए ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास के साथ-साथ उत्सर्जन कम करना बड़ी चुनौती है। ऐसे में CJI सूर्यकांत की टिप्पणी वैश्विक जलवायु नीतियों में समानता और न्यायपूर्ण ऊर्जा संक्रमण के मुद्दे को सामने रखती है।

उनका बयान सीधे तौर पर क्लीन एनर्जी के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाता है कि दुनिया को हर देश की ऐतिहासिक जिम्मेदारी, विकास की जरूरत और आर्थिक क्षमता को ध्यान में रखकर आगे बढ़ना चाहिए।

CJI सूर्यकांत ने Commonwealth की बैठक में क्लीन एनर्जी को लेकर विकासशील देशों की चिंताओं को वैश्विक मंच पर रखा। उनका मुख्य संदेश साफ था—जलवायु संकट से लड़ना जरूरी है, लेकिन इसका बोझ उन देशों पर असमान रूप से नहीं डाला जा सकता जो अभी विकास की प्रक्रिया में हैं।

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