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Wednesday, October 21, 2026
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन और भारत में 5 सितंबर को मनाए जाने वाले शिक्षक दिवस की ऐतिहासिक
5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाने की परंपरा डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जीवन और शिक्षकों के सम्मान से जुड़ी है।
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5 सितंबर को ही क्यों मनाया जाता है शिक्षक दिवस? डॉ. राधाकृष्णन की कहानी, जिसे जानना जरूरी है

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भारत में हर साल 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। यह दिन देश के महान दार्शनिक, शिक्षाविद और भारत के दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती से जुड़ा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि 5 सितंबर को उनका जन्मदिन मनाने के बजाय शिक्षक दिवस के रूप में मनाने का विचार खुद राधाकृष्णन से जुड़ा है? इसके पीछे एक दिलचस्प इतिहास है।

जन्मदिन को शिक्षक दिवस में बदलने की कहानी

डॉ. राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को मद्रास प्रेसीडेंसी के तिरुत्तनी में हुआ था। उन्होंने आगे चलकर दर्शनशास्त्र में उच्च शिक्षा हासिल की और 1909 में मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज में अध्यापन से अपने शिक्षक जीवन की शुरुआत की। बाद में वे मैसूर विश्वविद्यालय और कलकत्ता विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से भी जुड़े।

राधाकृष्णन केवल शिक्षक ही नहीं, बल्कि एक बड़े दार्शनिक और लेखक भी थे। उनकी विद्वता के कारण उन्हें ऑक्सफोर्ड में भी अध्यापन का अवसर मिला। आगे चलकर उन्होंने सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया और देश के उपराष्ट्रपति तथा राष्ट्रपति के पद तक पहुंचे।

1962 में आया बड़ा मोड़

शिक्षक दिवस की कहानी में सबसे महत्वपूर्ण साल 1962 है। इसी वर्ष राधाकृष्णन भारत के राष्ट्रपति बने और 5 सितंबर को उनका 75वां जन्मदिन आया।

इस मौके पर उनके प्रशंसक और शुभचिंतक जन्मदिन मनाना चाहते थे। लेकिन राधाकृष्णन ने व्यक्तिगत रूप से अपना जन्मदिन मनाने के बजाय इस दिन को देश के शिक्षकों के सम्मान में समर्पित करने का सुझाव दिया। इसके बाद 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई।

हालांकि, इतिहास का एक दूसरा पक्ष भी है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, शिक्षकों के एक महासंघ की ओर से भी इस दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव दिए जाने का उल्लेख मिलता है और एक ऐतिहासिक विवरण में जवाहरलाल नेहरू की भूमिका का भी दावा किया गया है। यानी इस परंपरा की शुरुआत को लेकर अलग-अलग विवरण मौजूद हैं, जबकि आधिकारिक तौर पर इसे राधाकृष्णन की इच्छा से जोड़ा जाता है।

राष्ट्रपति बनने से पहले शिक्षक और दार्शनिक थे राधाकृष्णन

राधाकृष्णन की पहचान सिर्फ एक राष्ट्रपति के तौर पर नहीं थी। उनका सबसे बड़ा परिचय एक शिक्षक और दार्शनिक का था।

उन्होंने भारतीय दर्शन को दुनिया के सामने रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे विश्वविद्यालयों में दर्शनशास्त्र पढ़ाते रहे और भारतीय विचार पर कई महत्वपूर्ण लेख और पुस्तकें लिखीं। 1948-49 के दौरान उन्होंने University Education Commission के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया।

इसके बाद वे 1952 से 1962 तक भारत के उपराष्ट्रपति रहे और फिर 1962 से 1967 तक देश के राष्ट्रपति के पद पर रहे।

शिक्षक दिवस सिर्फ एक समारोह नहीं

स्कूलों और कॉलेजों में 5 सितंबर को भाषण, सांस्कृतिक कार्यक्रम और शिक्षकों के सम्मान जैसे आयोजन होते हैं। लेकिन इस दिन का वास्तविक संदेश इससे कहीं बड़ा है।

राधाकृष्णन का जीवन इस बात का उदाहरण है कि एक शिक्षक का प्रभाव सिर्फ कक्षा तक सीमित नहीं रहता। शिक्षक विद्यार्थियों में सोचने, सवाल करने और समाज के प्रति जिम्मेदारी समझने की क्षमता विकसित करता है।

इसीलिए शिक्षक दिवस केवल शिक्षकों को फूल या उपहार देने का दिन नहीं, बल्कि उस भूमिका को याद करने का अवसर है जो शिक्षक किसी व्यक्ति और पूरे समाज के निर्माण में निभाते हैं।

भारत और दुनिया में शिक्षक दिवस की तारीख अलग

भारत में शिक्षक दिवस 5 सितंबर को मनाया जाता है, जबकि दुनिया में World Teachers’ Day 5 अक्टूबर को मनाया जाता है। इसलिए भारत का 5 सितंबर वाला शिक्षक दिवस अंतरराष्ट्रीय शिक्षक दिवस से अलग है।

5 सितंबर से जुड़ी खास बातें

  • 5 सितंबर को डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती मनाई जाती है।
  • वे भारत के दूसरे राष्ट्रपति थे।
  • वे प्रसिद्ध दार्शनिक, शिक्षक और शिक्षाविद थे।
  • 1962 में उनके 75वें जन्मदिन के अवसर पर शिक्षक दिवस की परंपरा से यह तारीख जुड़ी।
  • भारत में हर साल इस दिन शिक्षकों के योगदान को सम्मान दिया जाता है।
  • विश्व शिक्षक दिवस 5 अक्टूबर को मनाया जाता है।

आज भी प्रासंगिक है राधाकृष्णन की विरासत

आज शिक्षा का तरीका तेजी से बदल रहा है। डिजिटल क्लास, इंटरनेट और AI के दौर में भी शिक्षक की भूमिका खत्म नहीं हुई है। बल्कि बच्चों को सही दिशा देने, आलोचनात्मक सोच विकसित करने और जिम्मेदार नागरिक बनाने में शिक्षक की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई है।

5 सितंबर इसलिए सिर्फ राधाकृष्णन की जयंती नहीं है। यह उस गुरु-परंपरा को सम्मान देने का दिन है, जो पीढ़ियों को ज्ञान से आगे बढ़ाकर बेहतर इंसान बनाने की कोशिश करती है।

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