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Tuesday, October 27, 2026
नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी भोपाल में व्याख्यान के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुयन।
नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी भोपाल में आयोजित व्याख्यान में जस्टिस उज्जल भुयन ने छात्रों की गिरफ्तारी, जमानत की शर्तों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चिंता जताई।
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सुप्रीम कोर्ट के जज की चिंता: ‘विरोध करने पर छात्र जेल जा रहे हैं, बेल तक नहीं मिलती’

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जस्टिस उज्जल भुयन बोले- लोकतंत्र में असहमति और बहस की जगह लगातार सिमट रही है

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुयन ने देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग विचार रखने और लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराने वालों के लिए जगह लगातार कम होती जा रही है। कई मामलों में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों को गिरफ्तार कर लिया जाता है, उन्हें लंबे समय तक जमानत नहीं मिलती और जमानत मिलने के बाद भी ऐसी कड़ी शर्तें लगाई जाती हैं कि उनकी स्वतंत्रता सीमित हो जाती है।

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी भोपाल में दिया व्याख्यान

जस्टिस उज्जल भुयन शनिवार को नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (एनएलआईयू), भोपाल में आयोजित पांचवें जस्टिस जी.पी. सिंह स्मृति व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति, बहस और आलोचनात्मक सोच को सम्मान मिलना चाहिए, लेकिन आज कई वैध गतिविधियों को भी अपराध की तरह देखा जा रहा है।

छात्रों की गिरफ्तारी और बेल पर जताई चिंता

अपने संबोधन में जस्टिस भुयन ने कहा कि विश्वविद्यालय विचार-विमर्श और बहस के केंद्र होने चाहिए, लेकिन कई जगह विरोध करने वाले छात्रों को निलंबित किया जाता है, गिरफ्तार किया जाता है और 30 से 40 दिनों तक जमानत भी नहीं मिलती। उन्होंने कहा कि कई मामलों में अदालतें जमानत देते समय इतनी कठोर शर्तें लगा देती हैं कि व्यक्ति स्वयं अपनी अभिव्यक्ति पर रोक लगाने को मजबूर हो जाता है।

गंगा में इफ्तार पार्टी का उदाहरण

जस्टिस भुयन ने गंगा नदी में नाव पर इफ्तार पार्टी करने वाले युवाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है, फिर भी उन युवाओं को लगभग तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ऐसी गतिविधियों के लिए किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाना उचित है?

सोशल मीडिया पोस्ट और बेल की शर्तों का भी किया जिक्र

उन्होंने एक ऐसे मामले का भी उल्लेख किया जिसमें एक व्यक्ति ने मंत्री की टिप्पणी पर फेसबुक पोस्ट की थी। उस मामले में जमानत तो मिली, लेकिन पासपोर्ट जमा कराने और सोशल मीडिया का उपयोग नहीं करने जैसी शर्तें लगाई गईं। इसके अलावा उन्होंने दिल्ली दंगों से जुड़े गुलफिशा फातिमा मामले में भी जमानत से संबंधित कड़ी शर्तों का उल्लेख किया।

लोकतंत्र में असहमति जरूरी

जस्टिस भुयन ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती बहस, असहमति और विचारों की विविधता से होती है। विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक संस्थानों का उद्देश्य लोगों को स्वतंत्र रूप से सोचने और अपनी बात रखने का अवसर देना होना चाहिए, न कि उन्हें दंडात्मक कार्रवाई के भय में रखना।

मुख्य बातें

  • असहमति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे के सिमटने पर चिंता जताई।
  • शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों की गिरफ्तारी और लंबी हिरासत का मुद्दा उठाया।
  • बेल मिलने के बाद लगाई जाने वाली कठोर शर्तों पर सवाल खड़े किए।
  • गंगा में नाव पर इफ्तार करने वाले युवाओं की गिरफ्तारी का उदाहरण दिया।
  • विश्वविद्यालयों को स्वतंत्र बहस और आलोचनात्मक सोच का केंद्र बनाने पर जोर दिया।

जस्टिस उज्जल भुयन की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देश में छात्रों के विरोध-प्रदर्शनों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों को लेकर लगातार बहस जारी है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि लोकतंत्र की असली ताकत असहमति को सम्मान देने और विचारों के खुले आदान-प्रदान में निहित है।

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