गोवा में उमर खालिद के समर्थन पर हंगामा: पोस्टर दिखाने और नारे लगाने पर दो युवक हिरासत में

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद देशभर में हुए जश्न के बीच गोवा की राजधानी पणजी में एक नया विवाद सामने आया। उमर खालिद, शरजील इमाम और भीमा कोरेगांव-16 की रिहाई की मांग करते हुए पोस्टर दिखाने और नारे लगाने पर गोवा पुलिस ने दो युवकों को हिरासत में लिया है। पुलिस ने दोनों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की बात कही है।
क्या है पूरा मामला?
शनिवार को पणजी के आजाद मैदान में नीट पेपर लीक मामले को लेकर हुए देशव्यापी विरोध प्रदर्शन के बाद धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का जश्न मनाया जा रहा था। इसी दौरान दानिश नाम के युवक ने हाथ में एक पोस्टर लिया, जिस पर लिखा था, “उमर खालिद, शरजील इमाम, भीमा कोरेगांव-16 को रिहा करो।”
पुलिस ने दानिश से पहचान पत्र मांगा। मौके पर आईडी नहीं होने के कारण उसे पूछताछ के लिए पणजी पुलिस स्टेशन ले जाया गया। मीडिया से बातचीत में दानिश ने कहा कि वह उमर खालिद की रिहाई की मांग का समर्थन करता है।
दूसरे युवक को भी लिया गया हिरासत में
दानिश को हिरासत में लिए जाने के बाद प्रदर्शनकारियों ने उसके समर्थन में नारे लगाए और पुलिस मुख्यालय की ओर मार्च निकाला। इस दौरान पुलिस ने सुदिन दलवी नाम के दूसरे युवक को भी हिरासत में ले लिया। पुलिस का आरोप है कि दलवी ने भी उमर खालिद के समर्थन में नारे लगाए और मीडियाकर्मियों के साथ अभद्र व्यवहार किया।
BJYM ने की सख्त कार्रवाई की मांग
भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के कार्यकर्ता पुलिस स्टेशन पहुंचे और दोनों युवकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए धरना दिया। BJYM गोवा अध्यक्ष तुषार केलकर ने कहा कि राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों का समर्थन करने वालों पर गैर-जमानती धाराओं में मामला दर्ज किया जाना चाहिए।
पुलिस का क्या कहना है?
गोवा पुलिस के अनुसार दोनों युवकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। फिलहाल दोनों पुलिस हिरासत में हैं और मामले की जांच जारी है।
उमर खालिद और शरजील इमाम 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगा मामले में आरोपित हैं और न्यायिक हिरासत में हैं। दोनों पर लगे आरोपों का मामला अदालत में लंबित है और अभी अंतिम निर्णय नहीं आया है।
विवाद क्यों बढ़ा?
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद मनाया जा रहा जश्न उस समय विवाद में बदल गया जब प्रदर्शन के दौरान विवादित मामलों में जेल में बंद आरोपितों की रिहाई की मांग उठी। इस घटना ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, विरोध प्रदर्शन की सीमाओं और कानून-व्यवस्था को लेकर बहस छेड़ दी है।
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