जम्मू-कश्मीर में सियासी घमासान। CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस का प्रदर्शन। विधानसभा में भी हंगामा

जम्मू-कश्मीर में शुक्रवार, 25 सितंबर को चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर सियासी टकराव तेज हो गया। कांग्रेस ने जम्मू में प्रदर्शन करते हुए CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। प्रदर्शनकारियों ने चुनाव आयोग कार्यालय की ओर मार्च करने की कोशिश की, जिसके बाद पुलिस ने कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया। वहीं, श्रीनगर में चल रहे जम्मू-कश्मीर विधानसभा सत्र के दौरान कांग्रेस विधायकों ने सदन के अंदर भी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नारेबाजी और बैनर प्रदर्शन किया।
जम्मू में कांग्रेस का प्रदर्शन, कई नेता हिरासत में
जम्मू में कांग्रेस सांसद और AICC महासचिव डॉ. सैयद नसीर हुसैन के नेतृत्व में पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नारे लगाए और उनका पुतला भी जलाया।
कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग कार्यालय की ओर बढ़ने की कोशिश की, लेकिन वहां पहले से भारी पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई थी। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोका। इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की की स्थिति भी बनी और कई नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को बसों में बैठाकर हिरासत में लिया गया।
कांग्रेस ने इस प्रदर्शन को देशव्यापी अभियान का हिस्सा बताया है। पार्टी ने अपने राज्य संगठनों से 25 सितंबर को चुनाव आयोग के कार्यालयों की ओर मार्च करने का आह्वान किया था।
विधानसभा के अंदर भी कांग्रेस का प्रदर्शन
श्रीनगर में जम्मू-कश्मीर विधानसभा की कार्यवाही शुरू होते ही कांग्रेस विधायकों ने CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर बैनर दिखाए और नारे लगाए।
स्पीकर अब्दुल रहीम राथर ने कांग्रेस विधायकों से बैनर हटाकर अपनी सीटों पर बैठने को कहा। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आयोग विधानसभा के नियंत्रण में नहीं आता। स्पीकर ने प्रदर्शन जारी रहने पर कार्रवाई की चेतावनी दी। इसके बाद कांग्रेस विधायक अपनी सीटों पर लौटे और प्रश्नकाल आगे बढ़ सका।
आखिर कांग्रेस ज्ञानेश कुमार के खिलाफ क्यों है?
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि चुनावी वोटर लिस्ट की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया और चुनाव आयोग के अंदर सामने आए मतभेदों से जुड़ी है।
द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की जांच रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीने के दौरान कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की थी। रिपोर्ट के मुताबिक, इन आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, वोटर लिस्ट से नाम हटाने और बहाल करने, Form 6 में बदलाव तथा चुनावी डेटा के प्रबंधन जैसे मुद्दे शामिल थे।
रिपोर्ट के अनुसार, Form 6 में एक नया सवाल जोड़ा गया था, जिसमें नए मतदाता से उसके या उसके माता-पिता/दादा-दादी का नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में होने से संबंधित जानकारी मांगी गई। रिपोर्ट में कहा गया कि इस बदलाव पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी।
वोटर डेटा को लेकर भी उठे सवाल
रिपोर्ट में चुनावी डेटा और उसके डिजिटल प्रबंधन को लेकर भी दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का उल्लेख है। उनके अनुसार वोटर डेटाबेस तक पहुंच को अधिक केंद्रीकृत करने से जमीनी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों की भूमिका और पहुंच प्रभावित हो सकती है।
यही रिपोर्ट अब राजनीतिक विवाद का प्रमुख आधार बन गई है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इन रिपोर्ट किए गए मतभेदों के आधार पर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं और CEC के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
चुनाव आयोग का क्या कहना है?
दूसरी तरफ, चुनाव आयोग ने इन घटनाक्रमों को अलग तरीके से पेश किया है। आयोग का कहना है कि किसी संस्थान के भीतर अधिकारियों के बीच सुझाव, टिप्पणियां और अलग-अलग राय होना निर्णय लेने की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।
ECI के अनुसार अंतिम फैसले आयोग की निर्धारित प्रक्रिया के तहत लिए गए और सभी तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से अंतिम निर्णय हुए। इसलिए आंतरिक स्तर पर दर्ज किसी आपत्ति को अपने-आप में अंतिम चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ असहमति या अवैध निर्णय का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
यानी इस मामले में कांग्रेस के आरोप और चुनाव आयोग का पक्ष अलग-अलग हैं, जबकि जिन आंतरिक आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आई है, उनकी राजनीतिक और संस्थागत व्याख्या को लेकर विवाद जारी है।
विधानसभा में दूसरा बड़ा मुद्दा बना स्टेटहुड
CEC विवाद के साथ-साथ शुक्रवार को जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने को लेकर भी जोरदार हंगामा हुआ।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा तत्काल बहाल करने की मांग वाला प्रस्ताव सदन में पेश किया। प्रस्ताव में इसे केंद्र सरकार को भेजने की बात कही गई।
उमर अब्दुल्ला ने कहा कि परिसीमन और विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और अब राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग पूरी की जानी चाहिए। उन्होंने इसे जम्मू-कश्मीर के लोगों से किया गया वादा बताया।
स्टेटहुड प्रस्ताव में 2000 के ऑटोनॉमी प्रस्ताव का जिक्र क्यों बना विवाद?
इस प्रस्ताव में 26 जून 2000 को तत्कालीन जम्मू-कश्मीर विधानसभा द्वारा पारित स्वायत्तता संबंधी प्रस्ताव और नवंबर 2024 के विधानसभा प्रस्ताव का भी संदर्भ दिया गया।
बीजेपी विधायकों ने खास तौर पर 2000 के ऑटोनॉमी प्रस्ताव के संदर्भ पर आपत्ति जताई। बीजेपी का कहना था कि वह जम्मू-कश्मीर के राज्य के दर्जे की बहाली पर चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन स्वायत्तता और विशेष दर्जे से जुड़े मुद्दों को प्रस्ताव में शामिल करने का विरोध करती है।
इसके बाद बीजेपी विधायकों ने सदन में नारेबाजी शुरू कर दी और कुछ विधायक वेल में पहुंच गए। रिपोर्टों के अनुसार, बीजेपी विधायकों ने प्रस्ताव की प्रतियां भी फाड़ीं। सत्ता पक्ष की ओर से भी नारेबाजी हुई, जिससे सदन का माहौल काफी गरम हो गया।
हंगामा इतना बढ़ा कि मार्शलों को करना पड़ा हस्तक्षेप
हंगामे के दौरान कुछ विधायक वेल में पहुंचने की कोशिश करते दिखाई दिए। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, बीजेपी विधायक रंधावा वेल में पहुंचे और एक कुर्सी उठा ली, जिसके बाद मार्शलों ने हस्तक्षेप कर उन्हें सदन से बाहर किया। इसके बाद सदन की कार्यवाही 28 सितंबर तक स्थगित किए जाने की जानकारी सामने आई है।
एक ही दिन में दो बड़े राजनीतिक टकराव
शुक्रवार की घटनाओं को देखें तो जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक विवाद दो मोर्चों पर दिखाई दिया—
पहला: कांग्रेस ने CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जम्मू में प्रदर्शन किया और इस्तीफे की मांग की।
दूसरा: श्रीनगर की विधानसभा में कांग्रेस ने इसी मुद्दे को उठाया, जबकि इसके बाद उमर अब्दुल्ला के स्टेटहुड प्रस्ताव पर बीजेपी और सत्ता पक्ष के बीच जोरदार टकराव हुआ।
CEC को लेकर विवाद की पृष्ठभूमि में SIR, वोटर लिस्ट में बदलाव और चुनाव आयोग के अंदर दो चुनाव आयुक्तों द्वारा दर्ज की गई आपत्तियों की रिपोर्ट है। वहीं विधानसभा में हुआ दूसरा विवाद जम्मू-कश्मीर के पूर्ण राज्य के दर्जे और प्रस्ताव में पुराने स्वायत्तता संदर्भ को लेकर है।
अब आगे क्या?
फिलहाल CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस का आंदोलन देश के कई हिस्सों में जारी है। जम्मू में कई कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं की हिरासत के बाद भी पार्टी ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर अपने सवाल दोहराए हैं। दूसरी तरफ चुनाव आयोग अपने फैसलों को निर्धारित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत लिया गया बता रहा है।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में अब स्टेटहुड प्रस्ताव और उससे जुड़े राजनीतिक विवाद पर आगे की कार्यवाही पर नजर रहेगी। मौजूदा घटनाक्रम में दोनों मुद्दे—चुनाव आयोग पर कांग्रेस के सवाल और जम्मू-कश्मीर के राज्य के दर्जे की बहाली—अलग-अलग हैं, लेकिन शुक्रवार को दोनों ने विधानसभा की राजनीति को गरमा दिया।
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