25 साल बाद ST सर्टिफिकेट अमान्य मिला, फिर भी नहीं जाएगी पेंशन; सुप्रीम कोर्ट ने रिटायरमेंट लाभ सुरक्षित रखे

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम मामले में 25 साल से ज्यादा समय तक नौकरी करने के बाद अमान्य पाए गए ST सर्टिफिकेट वाले कर्मचारी के रिटायरमेंट और पेंशन लाभों को सुरक्षित रखने का फैसला किया है। कोर्ट ने कर्मचारी के अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र को सही नहीं माना, लेकिन लंबे समय तक की गई सेवा और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष शक्ति का इस्तेमाल किया।

1994 में ST सर्टिफिकेट के आधार पर मिली थी नौकरी
मामला शिरीष पंढरीनाथ पाटिल बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य का है। कर्मचारी को वर्ष 1994 में ‘टोकरे कोली’ अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र के आधार पर म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ऑफ ग्रेटर मुंबई में जूनियर इंजीनियर (सिविल) के पद पर नियुक्त किया गया था।
कई वर्षों तक नौकरी करने के बाद वर्ष 2020 में स्क्रूटनी कमेटी ने उनके कम्युनिटी सर्टिफिकेट को अमान्य घोषित कर दिया। इसके बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी स्क्रूटनी कमेटी के फैसले को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
कर्मचारी ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट के अंतरिम आदेश के कारण वह सेवा में बने रहे और आखिरकार 30 जून 2025 को सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से मांग की कि इतने लंबे समय तक सेवा करने के बाद उनके रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े अधिकार सुरक्षित रखे जाएं।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल थे।
सर्टिफिकेट अमान्य, लेकिन पेंशन लाभ बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि कर्मचारी का ST सर्टिफिकेट अमान्य घोषित करने वाले स्क्रूटनी कमेटी और हाईकोर्ट के आदेश में दखल नहीं दिया जा रहा है।
लेकिन कोर्ट ने यह भी देखा कि कर्मचारी ने 1994 से 30 जून 2025 तक तीन दशक से अधिक समय तक सेवा की। इन परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि उसे रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े लाभों से वंचित करना उचित नहीं होगा।
अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट ने किया विशेष अधिकार का इस्तेमाल
कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्ति का इस्तेमाल किया। इसके तहत कर्मचारी की 21 अक्टूबर 1994 से 30 जून 2025 तक की सेवा को केवल उसके रिटायरमेंट और पेंशन लाभों की गणना और भुगतान के सीमित उद्देश्य से सुरक्षित माना गया।
यह फैसला सामान्य नियम में बदलाव नहीं है, बल्कि कोर्ट ने इसे मामले के विशेष तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर दिया है।
भविष्य में ST प्रमाणपत्र के आधार पर नहीं मिलेगा लाभ
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट की। कर्मचारी को रिटायरमेंट लाभ मिलने का मतलब यह नहीं है कि कोर्ट ने उसके ‘टोकरे कोली’ ST होने के दावे को मान्यता दे दी है।
साथ ही, कर्मचारी या उसके परिवार का कोई सदस्य भविष्य में इस अमान्य प्रमाणपत्र के आधार पर किसी आरक्षण या अन्य लाभ का दावा नहीं कर सकेगा।
कोर्ट के फैसले का क्या मतलब है?
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक तरफ अमान्य जाति प्रमाणपत्र के आधार पर नियुक्ति के कानूनी प्रभाव को बरकरार रखा, वहीं दूसरी तरफ लंबे समय तक सेवा कर चुके कर्मचारी के रिटायरमेंट लाभों को पूरी तरह खत्म करने से राहत दी।
यानी इस मामले में कर्मचारी को नौकरी या ST दर्जे की वैधता का लाभ नहीं दिया गया, बल्कि उसकी लंबी सेवा को देखते हुए पेंशन और रिटायरमेंट लाभों की सुरक्षा की गई है।
फैसले की बड़ी बातें
- कर्मचारी को 1994 में ST सर्टिफिकेट के आधार पर नौकरी मिली थी।
- 2020 में स्क्रूटनी कमेटी ने सर्टिफिकेट अमान्य कर दिया।
- बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी फैसला बरकरार रखा।
- कर्मचारी 30 जून 2025 को रिटायर हुआ।
- सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत रिटायरमेंट और पेंशन लाभ सुरक्षित रखे।
- कोर्ट ने ST प्रमाणपत्र को वैध नहीं माना।
- भविष्य में इस अमान्य प्रमाणपत्र के आधार पर कोई लाभ लेने की अनुमति नहीं दी गई।
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