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Friday, October 30, 2026
सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े मामले की सुनवाई।
मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया में CJI की भूमिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अहम सवाल पूछे।
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मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में CJI की भूमिका क्यों नहीं? सुप्रीम कोर्ट के सवालों पर सरकार का जवाब, फैसला सुरक्षित

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नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। अदालत ने 2023 के कानून में चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को हटाए जाने पर केंद्र सरकार से कई सवाल पूछे। वहीं सरकार ने कानून का बचाव करते हुए कहा कि संसद को इस तरह का कानून बनाने का पूरा अधिकार है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने मामले को संविधान पीठ के पास भेजने की मांग पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या पूछा?

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने सुनवाई के दौरान पूछा कि जब CBI निदेशक जैसे महत्वपूर्ण पदों की चयन समिति में CJI शामिल हैं, तो चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान की नियुक्ति प्रक्रिया से उन्हें क्यों बाहर रखा गया।

अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग केवल स्वतंत्र रूप से काम ही न करे, बल्कि उसकी स्वतंत्रता जनता को दिखाई भी देनी चाहिए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य किसी व्यक्ति पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि नियुक्ति प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करना है।

2023 के कानून को लेकर विवाद क्या है?

मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में फैसला दिया था कि जब तक संसद नया कानून नहीं बनाती, तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक समिति की सिफारिश पर होगी, जिसमें शामिल होंगे—

  • प्रधानमंत्री
  • लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता)
  • भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI)

इसके बाद दिसंबर 2023 में केंद्र सरकार ने नया कानून बनाया। नए कानून के तहत CJI की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को चयन समिति में शामिल कर दिया गया। अब समिति में तीन सदस्य हैं—

  • प्रधानमंत्री
  • विपक्ष के नेता
  • प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे चयन समिति में सरकार का 2:1 का बहुमत हो जाता है, जिससे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

सरकार ने क्या दलील दी?

अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि संसद को कानून बनाने का संवैधानिक अधिकार है और उसके विधायी निर्णय पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।

सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री के पद की गरिमा और संवैधानिक जिम्मेदारी पर भरोसा किया जाना चाहिए। केवल इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि सरकार लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ काम करेगी।

हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि मामला प्रधानमंत्री पर अविश्वास का नहीं, बल्कि नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता और संस्थागत स्वतंत्रता का है।

संविधान पीठ को भेजने पर फैसला सुरक्षित

केंद्र सरकार ने दलील दी कि यह महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दा है, इसलिए मामले की सुनवाई पांच जजों की संविधान पीठ करे। वहीं याचिकाकर्ताओं ने इसका विरोध करते हुए कहा कि लंबी सुनवाई के बाद अब यह मांग करना उचित नहीं है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत ने सभी पक्षों से लिखित दलीलें भी दाखिल करने को कहा है।

लोकतंत्र के लिए क्यों अहम है यह मामला?

मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त देश में लोकसभा, विधानसभा, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनावों की निगरानी करते हैं। ऐसे में उनकी नियुक्ति प्रक्रिया की निष्पक्षता और स्वतंत्रता लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता से सीधे जुड़ी मानी जाती है।

अब सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि इस मामले की सुनवाई दो जजों की पीठ करेगी या इसे पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेजा भविष्य की नियुक्ति प्रक्रिया की दिशा तय कर सकता है।

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