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Friday, October 16, 2026
दिल्ली की अवैध इमारतों पर पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे की टिप्पणी
सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली में अवैध और जर्जर इमारतों पर बहस तेज है।
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दिल्ली की अवैध इमारतों पर हरीश साल्वे की दो टूक। बोले- सिर्फ बुलडोजर चलाना समाधान नहीं। लोगों को कहां भेजेंगे?

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दिल्ली के सत्य निकेतन में पीजी इमारत गिरने से सात लोगों की मौत के बाद राजधानी में अवैध और जर्जर इमारतों को लेकर बहस तेज हो गई है। इसी बीच पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने कहा है कि अवैध इमारतों को गिराना जरूरी हो सकता है, लेकिन केवल तोड़फोड़ से इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। उनका कहना है कि कार्रवाई से पहले सरकार को यह भी देखना होगा कि इन इमारतों में रहने वाले लोगों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी।

‘लोगों को सड़क पर नहीं फेंक सकते’

एनडीटीवी से बातचीत में हरीश साल्वे ने कहा कि अगर कोई इमारत गैर-कानूनी तरीके से बनाई गई है तो उसके लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ, वहां रहने वाले आम लोगों को बिना किसी विकल्प के बाहर कर देना भी उचित नहीं होगा।

साल्वे के मुताबिक कई मध्यमवर्गीय और निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार अपनी जीवनभर की बचत लगाकर ऐसे मकान खरीदते हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि उन्हें सस्ते और कानूनी आवास आसानी से उपलब्ध नहीं होते।

सत्य निकेतन हादसे ने उठाए बड़े सवाल

दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में कॉलेज छात्रों के रहने वाली एक इमारत ढहने से कम से कम सात लोगों की मौत हुई। इस हादसे के बाद राजधानी में पीजी और अन्य इमारतों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।

हादसे के बाद दिल्ली नगर निगम ने अवैध और जर्जर पीजी इमारतों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है। ताजा कार्रवाई में कई इमारतों को गिराया और सील किया गया है।

छात्रों के लिए भी सस्ते आवास का संकट

हरीश साल्वे ने पीजी में रहने वाले छात्रों का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना है कि छात्र ऐसी जगहों पर इसलिए नहीं रहते कि उन्हें असुरक्षित इमारतें पसंद हैं, बल्कि उन्हें पढ़ाई के लिए दिल्ली में रहने की जरूरत होती है और सस्ते आवास के विकल्प सीमित हैं।

सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली में छात्र आवास की कमी पर भी चर्चा तेज हुई है। इसी दिशा में दिल्ली के उपराज्यपाल ने छात्र आवास की कमी और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सुझाव देने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति को मंजूरी दी है।

‘दिल्ली का 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सा गैर-कानूनी’

हरीश साल्वे ने दावा किया कि दिल्ली में अवैध निर्माण की समस्या काफी पुरानी और व्यापक है। उन्होंने कहा कि उनके आकलन के अनुसार दिल्ली का 40 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा गैर-कानूनी निर्माण से प्रभावित हो सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी जमीन पर कब्जा करने, बिना अनुमति जमीन का इस्तेमाल बदलने या अवैध तरीके से अतिरिक्त मंजिलें बनाने वाले बिल्डरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही उन्होंने दिल्ली के बढ़ते जनसंख्या दबाव और आवास की जरूरतों के मुताबिक बेहतर शहरी नियोजन की जरूरत बताई।

सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंचा मामला

सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली में अवैध निर्माण और भवन सुरक्षा का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले के व्यापक पहलुओं पर विचार करने के संकेत दिए हैं और दिल्ली-एनसीआर में रिहायशी इलाकों के व्यावसायिक इस्तेमाल जैसे मुद्दों को भी देखा जा रहा है।

इस बीच अदालत की कार्यवाही के साथ-साथ दिल्ली में नगर निगम की कार्रवाई भी तेज हो गई है। बुधवार को ही एमसीडी ने 34 तोड़फोड़ की कार्रवाई, 17 सीलिंग और कई अन्य नोटिस जारी किए।

सिर्फ इमारत गिराने से नहीं निकलेगा रास्ता

हरीश साल्वे की बात का मुख्य संदेश यही है कि अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई के साथ किफायती और कानूनी आवास की व्यवस्था भी जरूरी है। केवल इमारतें गिराने से समस्या खत्म नहीं होगी, क्योंकि इसके बाद वहां रहने वाले परिवारों और छात्रों के सामने रहने की नई समस्या खड़ी हो सकती है।

बड़ी बातें

  • सत्य निकेतन हादसे में कम से कम सात लोगों की मौत हुई।
  • अवैध और जर्जर इमारतों के खिलाफ दिल्ली में कार्रवाई तेज हुई।
  • हरीश साल्वे ने सिर्फ तोड़फोड़ को स्थायी समाधान मानने से इनकार किया।
  • उन्होंने जिम्मेदार बिल्डरों और अवैध निर्माणकर्ताओं पर सख्त कार्रवाई की बात कही।
  • सस्ते और कानूनी आवास उपलब्ध कराने की जरूरत पर जोर दिया।
  • छात्रों के लिए सुरक्षित और किफायती पीजी/हॉस्टल व्यवस्था भी जरूरी बताई गई।

सत्य निकेतन हादसे ने दिल्ली के अवैध निर्माण, जर्जर इमारतों और छात्र आवास की समस्या को एक बार फिर सामने ला दिया है। हरीश साल्वे का सुझाव है कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई के साथ सरकार को आम लोगों के लिए सुरक्षित और किफायती आवास का विकल्प भी तैयार करना चाहिए। यही कदम अवैध निर्माण की समस्या के दीर्घकालिक समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है।

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