
कभी-कभी एक नाम केवल शब्द नहीं होता, वह इतिहास, संस्कृति और पहचान का प्रतीक बन जाता है। दक्षिण भारत का राज्य केरल अब आधिकारिक तौर पर ‘केरलम’ कहलाएगा। केंद्रीय कैबिनेट ने राज्य सरकार के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, जिसके बाद नाम परिवर्तन की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
क्यों उठी ‘केरलम’ नाम की मांग?
मलयालम भाषा में राज्य को हमेशा से ‘केरलम’ कहा जाता रहा है। ‘केरल’ अंग्रेज़ी और औपनिवेशिक प्रभाव से प्रचलित नाम था। राज्य सरकार और सामाजिक संगठनों का तर्क था कि जब स्थानीय भाषा में राज्य का नाम ‘केरलम’ है, तो आधिकारिक दस्तावेजों में भी वही नाम दर्ज होना चाहिए।
यह मांग केवल भाषाई बदलाव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ी हुई थी। लोगों का मानना है कि यह कदम राज्य की ऐतिहासिक जड़ों और परंपराओं को सम्मान देने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
कैबिनेट की मंजूरी और संवैधानिक प्रक्रिया
नई दिल्ली में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में प्रस्ताव पर मुहर लगा दी गई। अब आगे संविधान में आवश्यक संशोधन किया जाएगा। इसके बाद—
- सभी सरकारी दस्तावेजों में नया नाम दर्ज होगा
- स्कूल-कॉलेज की किताबों में बदलाव किया जाएगा
- सरकारी बोर्ड, साइनबोर्ड और आधिकारिक वेबसाइटों पर ‘केरलम’ लिखा जाएगा
- अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी राज्य का नाम ‘केरलम’ के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा
यह प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से लागू होगी।
आम जनता पर क्या असर पड़ेगा?
दैनिक जीवन में बड़ा बदलाव शायद महसूस न हो, लेकिन राज्यवासियों के लिए यह गर्व का क्षण है। यह अपनी भाषा और विरासत को औपचारिक मान्यता मिलने जैसा है।
‘केरलम’ शब्द का संबंध वहां की हरियाली और नारियल के पेड़ों से जोड़ा जाता है, जो राज्य की पहचान का अहम हिस्सा हैं। यह नाम उस सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर को दर्शाता है, जिसके लिए यह प्रदेश दुनिया भर में प्रसिद्ध है।
सांस्कृतिक पहचान को मिला सम्मान
नाम परिवर्तन की यह पहल भारत के संघीय ढांचे में राज्यों की सांस्कृतिक पहचान को सम्मान देने की परंपरा को और मजबूत करती है।
अगली बार जब आप दक्षिण भारत की यात्रा की योजना बनाएं, तो याद रखिए—आप ‘केरल’ नहीं, ‘केरलम’ जा रहे हैं।
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