परिसीमन बिल पर फिर खुला संसद का रास्ता? किरेन रिजिजू के बयान से बढ़ी हलचल

नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र के खत्म होने के बाद एक बार फिर परिसीमन बिल और महिला आरक्षण को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने ऐसा संकेत दिया है, जिससे संसद की दोबारा बैठक बुलाए जाने की अटकलें तेज हो गई हैं। हालांकि, उन्होंने यह साफ नहीं किया कि सरकार वास्तव में दोबारा सदन बुलाने जा रही है या नहीं।
रिजिजू ने कहा कि मानसून सत्र को अभी औपचारिक रूप से समाप्त यानी prorogue नहीं किया गया है। ऐसे में सरकार राष्ट्रपति से अनुरोध कर संसद को दोबारा बुला सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि संसद के इतिहास में पहले भी ऐसे कई मौके आए हैं, जब सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने के बाद उसी सत्र में दोबारा बुलाया गया।
क्या फिर बैठ सकती है संसद?
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने India Today को दिए इंटरव्यू में कहा कि संसद को कब बुलाना है, इसका फैसला सरकार करती है और राष्ट्रपति से सत्र बुलाने का अनुरोध किया जाता है।
उन्होंने कहा कि अगर सदन को औपचारिक रूप से prorogue नहीं किया गया है, तो उसे दोबारा बुलाया जा सकता है। जब उनसे पूछा गया कि क्या इसका मतलब विशेष सत्र की संभावना है, तो उन्होंने सीधे जवाब देने से इनकार कर दिया।
रिजिजू ने कहा कि इस सवाल का जवाब अभी नहीं दिया जा सकता। जब उनसे कहा गया कि उनके बयान से दोबारा संसद बैठने की संभावना खुली दिखाई दे रही है, तो उन्होंने जवाब दिया—“You can read both ways.”
13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुआ था सत्र
संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हुआ था और 13 अगस्त को दोनों सदनों को sine die यानी अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया था। लेकिन सत्र को औपचारिक रूप से prorogue नहीं किया गया।
यही तकनीकी स्थिति अब राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गई है। अगर सरकार फैसला करती है तो मौजूदा सत्र को ही आगे बढ़ाते हुए संसद की एक और बैठक बुलाई जा सकती है।
क्या वापस आ सकता है परिसीमन बिल?
रिजिजू के बयान के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार Delimitation Bill और Women’s Reservation Amendment Bill को दोबारा संसद में ला सकती है।
दोनों मुद्दे पहले भी सरकार के एजेंडे में रहे हैं। प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन के तहत 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिलाओं को संसद और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए परिसीमन की प्रक्रिया को जोड़ा गया है।
प्रस्तावित व्यवस्था में लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 816 सीटें करने की बात सामने आई है। यह परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर किए जाने का प्रस्ताव रहा है।
पिछली बार क्यों अटक गया था बिल?
इससे पहले संविधान (131वां संशोधन) विधेयक को लोकसभा में जरूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया था। अप्रैल में हुए मतदान में 298 सांसदों ने बिल के पक्ष में और 230 ने विरोध में वोट किया था, जबकि संवैधानिक संशोधन के लिए आवश्यक बहुमत हासिल नहीं हुआ।
यही वजह है कि सरकार इस बार बिल को दोबारा आगे बढ़ाने से पहले विपक्ष और NDA के सहयोगी दलों के बीच समर्थन जुटाने की कोशिश करती रही।
दक्षिणी राज्यों की चिंता बनी सबसे बड़ी चुनौती
परिसीमन को लेकर सबसे बड़ी राजनीतिक चिंता दक्षिणी राज्यों की है। विपक्षी दलों का तर्क रहा है कि आबादी के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण करने से उन राज्यों को नुकसान हो सकता है, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है।
सरकार की ओर से पहले यह संकेत दिया गया था कि सीटों की संख्या बढ़ाकर इस चिंता को दूर करने की कोशिश की जा सकती है। प्रस्ताव में लोकसभा की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 करने का विचार इसी राजनीतिक गणित का हिस्सा माना गया।
NDA के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मुद्दा?
परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े विधेयक को पास कराने के लिए सामान्य कानून की तुलना में ज्यादा मजबूत संसदीय समर्थन की जरूरत है। अप्रैल में सरकार के पास पर्याप्त संख्या नहीं थी, जिसके कारण विधेयक पारित नहीं हो सका।
इसके बाद सरकार ने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, DMK और अपने NDA सहयोगियों समेत अलग-अलग दलों से बातचीत शुरू की। किरेन रिजिजू ने राहुल गांधी से भी कई बार संपर्क किया था, लेकिन कांग्रेस की ओर से बिल के समर्थन को लेकर कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं मिली।
हालांकि, बाद के घटनाक्रम में NDA के लिए कुछ राजनीतिक समर्थन बढ़ता दिखाई दिया। शिरोमणि अकाली दल ने भी महिलाओं के आरक्षण और सीटों में समान वृद्धि के प्रस्ताव का समर्थन किया था।
क्या यह विशेष सत्र होगा?
अभी ऐसा कहना सही नहीं होगा।
5 अगस्त को ही रिजिजू ने स्पष्ट किया था कि 16 से 18 अगस्त के बीच किसी विशेष सत्र का कोई प्रस्ताव नहीं है। उस समय सरकार मौजूदा मानसून सत्र के दौरान ही समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही थी।
अब 27 अगस्त को उनके नए बयान ने तस्वीर को थोड़ा बदल दिया है। उन्होंने विशेष सत्र की पुष्टि नहीं की, लेकिन यह जरूर कहा कि सत्र को औपचारिक रूप से prorogue नहीं किए जाने की स्थिति में संसद को फिर बुलाया जा सकता है।
इसलिए फिलहाल इसे “संसद की दोबारा बैठक की संभावना खुली” कहना ज्यादा सही होगा, न कि सरकार द्वारा विशेष सत्र घोषित कर दिया गया है।
संसद के इतिहास का भी दिया हवाला
रिजिजू ने अपने बयान में संसद के इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि 1952 के बाद कई ऐसे मौके आए हैं जब सदन को sine die स्थगित किया गया लेकिन सत्र को prorogue नहीं किया गया और बाद में उसी सत्र में संसद को दोबारा बुलाया गया।
उन्होंने कहा कि ऐसे उदाहरणों की सूची भी वह उपलब्ध करा सकते हैं।
अब आगे क्या?
फिलहाल सरकार की ओर से दोबारा संसद बुलाने की कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। लेकिन रिजिजू के बयान ने यह संकेत जरूर दिया है कि परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे लंबित मुद्दों के लिए संसद का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं हुआ है।
अगर सरकार दोबारा बैठक बुलाती है, तो सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या वह विपक्ष और सहयोगी दलों को जरूरी संवैधानिक बहुमत के लिए साथ ला पाएगी।
किरण रिजिजू के ताजा बयान ने संसद और परिसीमन बिल को लेकर नई राजनीतिक अटकलों को जन्म दे दिया है। मानसून सत्र 13 अगस्त को स्थगित जरूर हुआ, लेकिन अभी तक उसे औपचारिक रूप से prorogue नहीं किया गया है। इसी वजह से सरकार के पास भविष्य में संसद को फिर बुलाने का संवैधानिक रास्ता खुला हुआ है।
हालांकि, अभी न तो विशेष सत्र की घोषणा हुई है और न ही परिसीमन बिल को दोबारा पेश करने की आधिकारिक तारीख तय हुई है। इसलिए फिलहाल इसे सरकार की ओर से दिया गया एक संकेत माना जा रहा है, अंतिम फैसला नहीं।





