उद्धव ठाकरे को बड़ा झटका: शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसद शिंदे गुट में शामिल, महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल

मुंबई, 23 जून 2026: महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के छह लोकसभा सांसदों ने पार्टी छोड़कर उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का दामन थाम लिया है। इस राजनीतिक बदलाव को शिंदे गुट ने ‘ऑपरेशन टाइगर’ की सफलता बताया है।
ये सांसद हुए शिंदे गुट में शामिल
शिंदे की शिवसेना में शामिल होने वाले सांसदों में संजय हरिभाऊ जाधव, भाऊसाहेब राजाराम वाकचौरे, ओमप्रकाश भूपालसिंह निंबालकर, संजय दिना पाटिल, संजय उत्तमराव देशमुख और नागेश बापूराव पाटिल आष्टीकर शामिल हैं।
जानकारी के अनुसार सभी सांसदों ने मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान एकनाथ शिंदे की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। इससे पहले सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर अलग गुट बनाने और विलय संबंधी जानकारी भी दी थी।
शिंदे बोले- अब हमारे साथ छह और ‘टाइगर’
सांसदों के शामिल होने पर एकनाथ शिंदे ने कहा कि “ऑपरेशन टाइगर सफल हो गया है। अब हमारे साथ छह और टाइगर हैं।” उन्होंने इसे 2022 में शुरू हुई राजनीतिक लड़ाई का दूसरा चरण बताया और दावा किया कि सभी सांसद बालासाहेब ठाकरे की विचारधारा वाली असली शिवसेना में वापस लौटे हैं।
इस घटनाक्रम के बाद लोकसभा में शिंदे गुट की संख्या बढ़कर 13 हो गई है, जबकि उद्धव ठाकरे गुट के पास अब केवल तीन सांसद बचे हैं।
उद्धव गुट ने साधा निशाना
इस राजनीतिक घटनाक्रम पर उद्धव ठाकरे गुट ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। आदित्य ठाकरे ने बागी सांसदों पर व्यक्तिगत स्वार्थ को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया। वहीं शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने पूरे मामले को लोकतंत्र और जनादेश के खिलाफ बताया।
महाराष्ट्र की राजनीति पर क्या होगा असर?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस घटनाक्रम से महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे की स्थिति और मजबूत हो सकती है। वहीं लोकसभा में उद्धव ठाकरे गुट की ताकत कमजोर पड़ने से आने वाले समय में पार्टी के संगठन और विधायकों पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।
इसके अलावा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को भी संसद में संख्यात्मक बढ़त मिलने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि इस पूरे मामले पर आगे कानूनी और संवैधानिक पहलुओं को लेकर बहस जारी रह सकती है।
महाराष्ट्र की राजनीति में हुए इस बड़े बदलाव पर अब सभी की नजर लोकसभा स्पीकर के संभावित फैसलों और आगे की राजनीतिक रणनीति पर टिकी हुई है।
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