

रांची। लोकसभा में वक्फ संशोधन बिल को लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है। सरकार इसे पारदर्शिता और न्यायपूर्ण व्यवस्था की ओर एक बड़ा कदम बता रही है, जबकि विपक्षी सदस्य इस पर सवाल उठा रहे हैं। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे (झारखंड के गोड्डा से) ने वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति के विरोध पर जवाबी हमला बोलते हुए पैगंबर मोहम्मद साहब के इतिहास का हवाला दिया। उन्होंने सवाल किया: “अगर पहला वक्फ देने वाला यहूदी था, तो हिंदुओं को वक्फ में शामिल होने से क्यों रोका जाए?” यह विवाद तब और गरमाया जब सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद ने वक्फ बिल पर सरकार को निशाने पर लेते हुए पूछा, “12 गैर-मुस्लिमों को वक्फ बोर्ड में क्यों शामिल किया जा रहा है? जब काशी विश्वनाथ ट्रस्ट में एक भी मुस्लिम नहीं है, तो यहां यह दोहरा मापदंड क्यों?” इसके जवाब में दुबे ने लोकसभा में शायराना अंदाज़ में कहा, “लम्हों ने खता की है, सदियों ने सजा पाई है…”
पहला वक्फ देने वाला एक यहूदी
दुबे ने ऐतिहासिक तथ्य गिनाते हुए बताया: “पैगंबर मोहम्मद साहब को पहला वक्फ देने वाला एक यहूदी व्यक्ति मुखेरख था, जिसने अपने सात बगीचे दान किए। उनकी मृत्यु के बाद पैगंबर साहब ने इस संपत्ति से पहला चैरिटेबल वक्फ बोर्ड शुरू किया। इमरान साहब, अगर शुरुआत में ही गैर-मुस्लिम का योगदान था, तो आज हिंदुओं को रोकने का दावा कैसे कर सकते हैं? यह पैगंबर के सिद्धांतों के खिलाफ होगा।” इस बयानबाजी के बीच, सदन में हंगामा बढ़ गया, जहां एक तरफ सरकार बिल को सुधार का माध्यम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे धार्मिक संस्थाओं में अनावश्यक हस्तक्षेप मान रहा है।
चुनिंदा टोन
- विवाद को केंद्रित करते हुए: “वक्फ बिल पर टकराव: इतिहास बनाम राजनीति”
- प्रश्नवाचक: “क्या वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिमों की भागीदारी ऐतिहासिक तथ्यों से मेल खाती है?”
- काव्यात्मक: “लम्हों की खता और सियासी सजा: वक्फ बिल पर शब्दों की जंग”