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Thursday, October 22, 2026
एशियाई बाजारों में 1997 जैसे आर्थिक संकट की आशंका और AI निवेश
HSBC के चीफ इकोनॉमिस्ट ने एशियाई बाजारों में बढ़ते जोखिमों को लेकर चेतावनी दी है।
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एशिया में 1997 जैसा आर्थिक संकट आने का खतरा? HSBC के चीफ इकोनॉमिस्ट ने बताया नया ‘विलेन’

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एशियाई बाजारों को लेकर एक बड़ी आर्थिक चेतावनी सामने आई है। HSBC के चीफ इकोनॉमिस्ट फ्रेडरिक न्यूमैन ने मौजूदा हालात की तुलना 1997 के एशियाई वित्तीय संकट से की है। उन्होंने अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी, जापानी येन की कमजोरी और AI सेक्टर में बढ़ते निवेश को ऐसे संकेत बताया है, जिन पर नजर रखने की जरूरत है। हालांकि, न्यूमैन का कहना है कि आज की एशियाई अर्थव्यवस्थाएं 1997 की तुलना में काफी मजबूत हैं और दोनों दौर में महत्वपूर्ण संरचनात्मक अंतर मौजूद हैं।

1997 जैसे दिख रहे कुछ संकेत

HSBC के अर्थशास्त्री के मुताबिक अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड और जापानी येन की चाल में कुछ ऐसी समानताएं नजर आ रही हैं, जो 1997 से पहले के दौर की याद दिलाती हैं। अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड फरवरी से करीब 80 बेसिस प्वाइंट बढ़कर लगभग 4.79% तक पहुंच गई है।

वहीं जापानी येन में भी बड़ी गिरावट देखी गई है। मौजूदा चक्र में येन जनवरी 2021 के करीब 103 प्रति डॉलर से जुलाई में लगभग 163 तक कमजोर हुआ, यानी करीब 57 फीसदी की गिरावट।

इस बार बैंक नहीं, AI बन सकता है ‘विलेन’

1997 के संकट में एशियाई देशों की कमजोर बैंकिंग व्यवस्था और विदेशी पूंजी पर निर्भरता बड़ी समस्या बनी थी। लेकिन आज स्थिति अलग है। कई एशियाई अर्थव्यवस्थाएं बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भंडार रखती हैं और नेट कैपिटल एक्सपोर्टर बन चुकी हैं।

इस बार नई कमजोरी AI और सेमीकंडक्टर की मांग से जुड़ी हो सकती है। दक्षिण कोरिया, जापान, ताइवान और सिंगापुर जैसे प्रमुख एशियाई विनिर्माण केंद्रों की अर्थव्यवस्थाएं इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर निर्यात पर काफी निर्भर हैं। इन उत्पादों की मांग अमेरिकी टेक कंपनियों के AI इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च से भी जुड़ी हुई है।

अगर अमेरिकी कंपनियों ने AI खर्च घटाया तो?

न्यूमैन के मुताबिक अगर बढ़ती अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड और महंगी उधारी के कारण अमेरिकी हाइपरस्केल कंपनियां डेटा सेंटर पर खर्च कम करती हैं, तो इसका सीधा असर एशिया के एक्सपोर्ट सेक्टर पर पड़ सकता है।

इसका असर जरूरी नहीं कि अचानक बैंकिंग संकट के रूप में दिखाई दे। इसके बजाय एशिया की बड़ी चिप कंपनियों के ऑर्डर बुक में तेजी से गिरावट आ सकती है। यानी इस बार जोखिम वित्तीय व्यवस्था से ज्यादा मांग में कमजोरी के रूप में सामने आ सकता है।

1997 और 2026 में बड़ा फर्क भी है

हालांकि 1997 की तुलना ने चिंता बढ़ाई है, लेकिन इसे सीधे नए एशियाई वित्तीय संकट की भविष्यवाणी नहीं माना जा रहा है। न्यूमैन के अनुसार दोनों दौर में समानताओं से ज्यादा महत्वपूर्ण उनके बीच के संरचनात्मक अंतर हैं।

1990 के दशक में एशियाई देश विदेशी पूंजी पर काफी निर्भर थे और उनके चालू खाते में बड़े घाटे थे। आज कई एशियाई देशों के पास मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार हैं और उनकी वित्तीय स्थिति पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है।

भारत पर क्या असर हो सकता है?

भारत 1997 के संकट से सीधे प्रभावित प्रमुख देशों में शामिल नहीं था, लेकिन एशिया में बड़े स्तर पर आर्थिक कमजोरी आने पर इसका असर वैश्विक व्यापार, शेयर बाजार, पूंजी प्रवाह और टेक्नोलॉजी सेक्टर के जरिए भारत तक पहुंच सकता है।

फिलहाल इसे संकट की घोषणा नहीं, बल्कि जोखिम को लेकर चेतावनी के तौर पर देखना ज्यादा उचित है। एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की मौजूदा वित्तीय स्थिति 1997 से काफी अलग है।

1997 के संकट की याद दिलाने वाले कुछ संकेत जरूर दिखाई दे रहे हैं, लेकिन इस बार कहानी अलग है। कमजोर बैंक नहीं, बल्कि AI की अमेरिकी मांग पर एशिया की बढ़ती निर्भरता नई चुनौती बन सकती है। अगर AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर अमेरिकी खर्च में बड़ी कमी आती है, तो इसका असर एशिया के सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात पर पड़ सकता है।

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