दूसरी पत्नी को भी मिलेगी फैमिली पेंशन, पटना हाईकोर्ट ने 17 साल बाद कुसुम देवी को दिलाया न्याय

पटना हाईकोर्ट ने फैमिली पेंशन को लेकर एक अहम फैसला सुनाते हुए मृत सरकारी कर्मचारी की दूसरी पत्नी कुसुम देवी को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में उन्हें पारिवारिक पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता। करीब 17 साल तक चले संघर्ष के बाद कुसुम देवी को न्याय मिला है।
दूसरी शादी पर क्या कहा हाईकोर्ट ने?
मामला बिहार के सीतामढ़ी की कुसुम देवी से जुड़ा है। वह सरकारी कर्मचारी जय लाल साह की दूसरी पत्नी थीं। उनके पति की मृत्यु 17 अप्रैल 2009 को हुई थी। इसके बाद उन्हें फैमिली पेंशन देने से इनकार कर दिया गया था।
कुसुम देवी की ओर से बताया गया कि जय लाल साह ने दूसरी शादी के लिए विभाग से बाकायदा अनुमति मांगी थी। उन्होंने 28 फरवरी 1982 को विभाग को आवेदन दिया था। पहली पत्नी को भी इस विवाह से आपत्ति नहीं थी और दोनों महिलाएं साथ रहती थीं।
विभाग ने नहीं दी अनुमति, पेंशन भी रोकी
कोर्ट के मुताबिक, कर्मचारी द्वारा दूसरी शादी की अनुमति के लिए आवेदन किए जाने के बावजूद विभाग ने उस पर कोई निर्णय नहीं लिया। बाद में जल संसाधन विभाग के चीफ इंजीनियर ने 5 फरवरी 2019 के आदेश से कुसुम देवी को फैमिली पेंशन देने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट ने अब इस आदेश को रद्द कर दिया है।
कोर्ट ने नियम 23(2) की अलग व्याख्या की
पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1976 के नियम 23(2) की व्याख्या करते हुए कहा कि यह प्रावधान दूसरी शादी पर पूरी तरह रोक नहीं लगाता। इसमें सरकार से अनुमति लेने की व्यवस्था है। कोर्ट ने माना कि जब कर्मचारी ने सेवा के दौरान ही अनुमति के लिए आवेदन किया था और विभाग ने उस पर विचार नहीं किया, तो सिर्फ इसी आधार पर महिला को पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता।
17 अप्रैल 2009 से मिलेगा पेंशन का लाभ
हाईकोर्ट ने विभाग को निर्देश दिया है कि कुसुम देवी को उनके पति की मृत्यु की तारीख यानी 17 अप्रैल 2009 से फैमिली पेंशन का भुगतान किया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि पहली पत्नी की मृत्यु के बाद कुसुम देवी एकमात्र स्पाउस के रूप में रह गई थीं और उन्हें बुढ़ापे में सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
मामले की सुनवाई के दौरान पटना हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के राधा देवी मामले का भी हवाला दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले के तथ्यों को देखते हुए कुसुम देवी को पेंशन से वंचित करना उचित नहीं होगा।
इस फैसले का क्या मतलब है?
यह फैसला खास तौर पर उन मामलों में महत्वपूर्ण है जहां सरकारी कर्मचारी ने दूसरी शादी के लिए विभागीय अनुमति मांगी हो, लेकिन विभाग ने उस आवेदन पर कोई निर्णय न लिया हो। हालांकि, इसे हर दूसरी शादी के मामले में अपने आप फैमिली पेंशन मिलने का सामान्य नियम नहीं माना जाना चाहिए। इस मामले में कोर्ट ने विशेष परिस्थितियों और उपलब्ध रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए फैसला दिया है।
17 साल बाद मिला न्याय
कुसुम देवी लंबे समय से फैमिली पेंशन के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही थीं। पटना हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब उन्हें 2009 से फैमिली पेंशन मिलने का रास्ता साफ हो गया है। यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के पारिवारिक पेंशन से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम माना जा रहा है।
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