डोरंडा रिवर साइड रिसालदार नगर की यह तस्वीर बहुत कुछ बयां करती है।

कभी इस बस्ती में बच्चों की चहचहाहट गूंजती थी। सुबह-शाम लोगों का मिलना-जुलना, गलियों में खेलते बच्चे, एक-दूसरे के दुख-सुख में साथ खड़े रहने वाले पड़ोसी—यही पहचान थी डोरंडा रिवर साइड रिसालदार नगर की। लेकिन आज वही बस्ती वीरान हो चुकी है।
जिला प्रशासन की कार्रवाई में पोकलेन चला और वर्षों से आशियाना बनाकर रह रहे गरीब परिवारों के घर जमींदोज कर दिए गए। जिन दीवारों में कभी सपने सजे थे, जहां पीढ़ियां बड़ी हुईं, वहां अब सिर्फ मलबा और सिसकियां बची हैं।
स्थानीय लोगों का दर्द शब्दों में समेट पाना मुश्किल है। लोग कह रहे हैं—”बच्चों का एग्जाम चल रहा है, त्योहार सामने हैं, रमजान आने वाला है… अब हम कहां जाएं?” किसी के पास इस सवाल का जवाब नहीं है।
लोगों का कहना है कि वे एक-दो दिन से नहीं, बल्कि 40–50 सालों से यहां रह रहे थे। उनके बाप-दादा ने इस जगह को बसाया था। यह सिर्फ घर नहीं थे, बल्कि वर्षों की मेहनत, बचपन की यादें और बुजुर्गों की निशानियां थीं।
गुस्सा भी है, बेबसी भी। लोग कहते हैं—”लड़ें तो किससे लड़ें? सरकार से नहीं लड़ सकते।” इसी मजबूरी में वे बस हाथ जोड़कर विनती कर रहे हैं कि सरकार उन्हें कहीं बसने की जगह दे दे।
सबसे ज्यादा सवाल महिलाओं और बच्चों को लेकर है। उजड़ने के बाद वे कहां जाएंगे? सिर छुपाने की जगह, बच्चों की पढ़ाई, रोजमर्रा की जिंदगी—सब कुछ एक झटके में छिन गया।
स्थानीय निवासियों का दर्द एक ही सवाल पर आकर ठहर जाता है—क्या विकास की कीमत हमेशा गरीबों को ही चुकानी होगी? जब सरकार के पास जमीन की कमी नहीं है, तो वर्षों से बसे इन परिवारों को पहले पुनर्वास क्यों नहीं दिया गया?
डोरंडा रिवर साइड रिसालदार नगर आज सिर्फ एक उजड़ी हुई बस्ती नहीं है, बल्कि यह सिस्टम से पूछता एक सवाल है—आखिर हमारा कसूर क्या था?
यह कहानी सिर्फ एक इलाके की नहीं, बल्कि उन तमाम गरीब परिवारों की है, जिनके लिए घर सिर्फ ईंट और सीमेंट नहीं, बल्कि जिंदगी भर की यादें और पहचान होता है।
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