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Tuesday, February 3, 2026
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असम में गरजे हेमंत सोरेन: ‘हक के लिए जरूरत पड़ी तो झारखंड से आएंगे आदिवासी’, तिनसुकिया में फूंका चुनावी बिगुल

असम के तिनसुकिया में आदिवासी महासभा को संबोधित करते झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन।
तिनसुकिया की आदिवासी महासभा में गरजे हेमंत सोरेन। कहा- आदिवासियों को कमजोर समझने वाले भूल न करें, जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए हम संगठित होकर जवाब देंगे।
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ज़रूरत पड़ी तो असम में झारखंड से आएंगे आदिवासी” – सीएम

झारखंड के मुख्यमंत्री और झामुमो (JMM) प्रमुख हेमंत सोरेन ने असम के तिनसुकिया में आयोजित ‘आदिवासी महासभा’ को संबोधित करते हुए एक बड़ा राजनीतिक दांव खेला है। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के गढ़ में हुंकार भरते हुए सोरेन ने स्पष्ट कर दिया कि आगामी असम विधानसभा चुनावों में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) एक निर्णायक भूमिका निभाने जा रही है।

आदिवासियों के हक के लिए आर-पार की जंग का ऐलान

आल असम आदिवासी स्टूडेंट्स एसोसिएशन के आमंत्रण पर पहुंचे हेमंत सोरेन ने अपने संबोधन की शुरुआत पारंपरिक “जोहार” से की। उन्होंने असम के आदिवासियों के साथ अपनी एकजुटता प्रदर्शित करते हुए कहा, “आदिवासी समाज स्वाभिमानी है। अगर उसे बार-बार मजबूर किया गया, तो भगवान बिरसा मुंडा की संतानें विद्रोह करने से पीछे नहीं हटेंगी। जरूरत पड़ी तो असम के भाइयों के लिए झारखंड से आदिवासी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होने आएंगे।”

मुख्य आकर्षण: हेमंत सोरेन के भाषण की बड़ी बातें

  • झारखंड से मदद का वादा: सोरेन ने कहा कि असम के आदिवासियों को अकेला नहीं छोड़ा जाएगा।
  • सामंती सोच पर प्रहार: उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ ताकतें आदिवासियों को आर्थिक और बौद्धिक रूप से कमजोर बनाए रखना चाहती हैं।
  • चाय बागान श्रमिकों का मुद्दा: सोरेन ने उठाया कि देश का चाय उद्योग आदिवासियों के खून-पसीने से चलता है, लेकिन उन्हें न्यूनतम मजदूरी तक नहीं मिल रही।
  • केंद्रीय एजेंसियों का जिक्र: उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष ने ED और CBI के जरिए उनकी सरकार गिराने की कोशिश की, जिसे जनता ने नाकाम कर दिया।

“हम कमजोर नहीं, हमें संगठित होने में समय लगता है”

हेमंत सोरेन ने झारखंड आंदोलन और ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन के संघर्षों को याद करते हुए कहा कि जब अलग राज्य की मांग की गई थी, तब आदिवासियों का मजाक उड़ाया गया था। लेकिन 2000 में झारखंड बनकर रहा। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज चींटियों की तरह एकजुट होकर लड़ना जानता है।

“जो लोग खुद को आदिवासियों का हितैषी बताते हैं, वे कभी नहीं चाहते कि यह समाज मजबूत हो। क्योंकि अगर आदिवासी, दलित और पिछड़े शिक्षित और सशक्त हो गए, तो वे अपने अधिकारों पर सवाल पूछेंगे।” — हेमंत सोरेन

असम चुनाव और JMM की रणनीति

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि हेमंत सोरेन का यह दौरा असम में बसे ‘झारखंडी मूल’ के आदिवासियों को एकजुट करने की एक बड़ी कोशिश है। असम के चाय बागानों में काम करने वाले लाखों श्रमिकों का सीधा संबंध झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ से है।

आदिवासी महासभा के मुख्य संदेश:

  1. राजनीतिक जवाब: आदिवासियों को सिर्फ वोट बैंक न बनकर राजनीतिक रूप से संगठित होना होगा।
  2. संवैधानिक संस्थाओं का बचाव: सोरेन ने आरोप लगाया कि वोटर पुनरीक्षण के नाम पर गरीबों से वोट का अधिकार छीनने की साजिश हो रही है।
  3. महिला सशक्तिकरण: उन्होंने झारखंड की तर्ज पर असम में भी महिलाओं और गरीबों के लिए मजबूत योजनाओं की वकालत की।

हेमंत सोरेन का असम दौरा केवल एक जनसभा नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक ध्रुवीकरण की शुरुआत है। हिमंता बिस्वा सरमा बनाम हेमंत सोरेन की यह जंग आने वाले समय में असम की राजनीति में नए समीकरण पैदा कर सकती है।

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